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Saturday, 18 November 2017

वीडियो कैमरा – व्यूफाइंडर (Viewfinder)

कैमरे के व्यूफाइंडर को कैसे सेट अप और उपयोग करना है

यह पोस्ट काले और सफेद (Black and White) इलेक्ट्रॉनिक व्यूफाइंडर (ईवीएफ) से संबंधित है, हालांकि रंगीन व्यूफाइंडर (Color Viewfinder) मूल रूप से उसी तरह काम करते हैं। (चित्र क्रमांक 14(a) देखें). 

विभिन्न कैमरों में ईवीएफ को एडजस्ट करने के लिए कई विकल्प हैं। उपभोक्ता कैमकोर्डर (Consumer Camcorder) आमतौर पर फोकस / शार्पनेस एडजस्ट करने तक सीमित है, जबकि पेशेवर कैमरों में कई विकल्प हैं निम्नलिखित प्रक्रियाओं के माध्यम से कार्य करें, उन कार्यों की अनदेखी करें जो आपके कैमरे पर उपलब्ध नहीं हैं। 

चित्र क्रमांक 14(a) 
व्यूफाइंडर के ब्राइटनेस और कंट्रास्ट सेट करने के लिए - 
1. कैमरा को कलर बार (Color Bar) विकल्प में स्विच करें.
2. व्यूफाइंडर की ब्राइटनेस और कंट्रास्ट को तब तक एडजस्ट करें जब तक कि स्मूथ ग्रेस्केल नहीं देखते हैं सफेद रंग से काले रंग तक । इसके अलावा आपको प्रत्येक कलर बार के बीच में एक विभाजन रेखा (dividing line) दिखाई देनी चाहिए।
3. अब कैमरा को वापस पिक्चर पर स्विच करें.
4. एक प्रोफेशनल मॉनिटर पर अपने एक्सपोजर की जांच करें, या तो कैमरे के आउटपुट से केबल को कनेक्ट करके या एक टेस्ट रिकॉर्ड करके.

इलेक्ट्रॉनिक व्यूफाइंडर पर कुछ नोट्स -
1. पेशेवर कैमकॉर्डर (Professional Camcorder) में आम तौर पर काले और सफेद EVFs का उपयोग करते हैं उपभोक्ता कैमकोर्डर के साथ रंगीन ईवीएफ अधिक लोकप्रिय हो रहे हैं
2. ईवीएफ अधिकतर WYSIWYG (What you see is what you get) की तर्ज पर काम करता है । इसका मतलब यह है कि अगर व्यूफाइंडर में दिख रही इमेज की ब्राइटनेस बदलती है, तो रिकॉर्ड किए गए सिग्नल में भी ब्राइटनेस बदलती है. एक बार आपके व्यूफाइंडर को सही ढंग से सेट-अप करने के बाद, आप अपनी तस्वीर की गुणवत्ता को सिर्फ देखकर ही न्याय कर सकते हैं (यानी यह कि आपका एक्सपोजर सही है या नहीं, यह देखने के लिए एफ-स्टॉप सूचक का उपयोग करने की आवश्यक नहीं है)।
3. व्यूफाइंडर में दिखाई देने वाले संदेश आपको बहुमूल्य जानकारी देते हैं. इन सभी का मतलब क्या है यह समझने की कोशिश करें.
4. यदि आपका व्यूफाइंडर फॉगिंग कर रहा है, तो अपनी आंख को आई-पिस (Eye piece) से थोड़ा दूर रखें। साथ ही, आपके तरल पदार्थों के सेवन को सीमित करें - यह पसीने को कम करता है, जो कि फॉगिंग का मुख्य कारण होता है.
5. कई व्यूफाइंडर आइपीस को खोला या फ़्लिप किया जा सकता है, जिससे आप कैमरे से थोडा दूर खड़े हो सकते हैं। यह और जायदा उपयोगी हो सकता है जब अगर आपके पास कैमरा ट्राईपोड पर रखा हो, या अगर एक से अधिक व्यक्ति व्यूफाइंडर को देखना चाहते हैं. यह आंखों की थकान को कम करने में भी मदद कर सकता है।

ज़ेबरा स्ट्राइप्स – 
ज़ेबरा स्ट्राइप्स या ज़ेबरा, पेशेवर कैमरों की एक विशेषता है जो एक्सपोजर स्तरों (Exposure Level) का संकेत देते हैं। जब यह सक्रिय होता है, तब विकर्ण लाइन (Diagonal Line) चित्र के किसी भी हिस्से में प्रकट होती है जो ओवर-एक्सपोजर का सन्देश देती है. चित्र क्रमांक 14(b) में देखें.
ये लाइन्स केवल व्यूफाइंडर में दिखाई देती हैं- वे कैमरे से आउटपुट लेने पर या रिकॉर्ड करने पर दिखाई नहीं देतीं. 

चित्र क्रमांक 14(b) 
ज़ेबरा स्ट्रिप्स को सेट करने के लिए-
ज़ेबरा स्ट्राइप्स को चालू करने के लिए "ज़ेबरा स्ट्रिप्स" लेबल वाला स्विच को चालू कीजिये. 
अगर कैमरा में विभिन्न ज़ेबरा सेटिंग्स (जैसे 75% या 100%) के बीच बदलने का विकल्प है, तो आपको पता होना चाहिए कि आप किस सेटिंग का उपयोग कर रहे हैं, और उसके परिणाम क्या होंगे.



Wednesday, 26 April 2017

वीडियो कैमरा - फंक्शन (Functions)

अधिकांश घरेलू कैमकोडर (Camcorder) स्वचालित रूप से काम करते हैं. आपको बस इतना करना है कि उन्हें चालू करें, दिशा दें और रिकॉर्ड बटन दबा दें. ज्यादातर स्थितियों में यह ठीक है, लेकिन स्वचालित कैमरों में कुछ सीमाएं भी हैं. अगर आप अपने कैमरा वर्क में सुधार लाना चाहते हैं, तो आपको अपने कैमरे का नियंत्रण में रखना सीखना होगा. इसका अर्थ अधिक से अधिक मैनुअल फ़ंक्शंस (Manual functions) का उपयोग करना है। वास्तव में, पेशेवर कैमरे के पास बहुत कम स्वचालित फ़ंक्शन होते हैं, और पेशेवर कैमरा ऑपरेटर्स कभी-कभी ऑटो फोकस या ऑटो-आईरिस (Auto Iris) का उपयोग करते हैं।

ऐसे में अधिकतर लोग पूछते हैं कि "क्यों नहीं”? मेरा ऑटो फोकस ठीक काम करता है, और मेरे चित्र ठीक दिखते हैं।" इसके दो जवाब हैं:

1. यद्यपि ऑटो-फंक्शंस आमतौर पर अच्छा काम करते हैं, पर कुछ ऐसी परिस्थितियां होती हैं जिसमे वे सही परिणाम नहीं दे पाते हैं.
2. आपका कैमरा नहीं जान सकता कि आप क्या चाहते हैं सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त करने के लिए या एक कोई विशेष इफ़ेक्ट दिखाने के लिए अक्सर ऑटो फंक्शन की जगह मैनुअल फंक्शन पर काम करना आवश्यक होता है.

जैसे-जैसे आप कैमरे के फंक्शन के बारे में और अधिक जानेंगे वैसे-वैसे आप मैनुअल फ़ंक्शंस के बेहतर परिणाम की सराहना करना शुरू कर देंगे. 
सबसे जायदा उपयोग होने वाले कैमरा फंक्शन को निचे संक्षेप में समझाया गया है (इसका पूरा विवरण आगे के पोस्ट में दिया गया है) –

               
                                                      चित्र क्रमांक - 4(a)                                        
                                                                       प्रोफेशनल कैमकोडर (Professional Camcorder)                                                              
    
                           चित्र क्रमांक - 4(b) 
                                                                 उपभोक्ता स्तरीय कैमकोडर  (Consumer Level Camcorder)                                                                       
ज़ूम (Zoom) – यह वह फ़ंक्शन है, जो विषय को आपके दृष्टिकोण के करीब ले आता है, या उससे दूर ले जाता है। यह बिलकुल कैमरे को विषय के करीब या अधिक दूर ले जाने के समान है. पेशेवर कैमरे में आमतौर पर मैनुअल फोकस रिंग लेंस के सामने  होती है (दृश्य 4(a) में देखें)

ध्यान दें कि जब ज़ूम इन करते हैं, उस दौरान तब चित्र (फ्रेम-Frame) को स्थिर रखना अधिक कठिन होता है. ऐसे में आप कैमरे को विषय के करीब ले जा सकते हैं और फिर ज़ूम आउट कर सकते हैं जिससे फ्रेमिंग वही रहेगी. लंबे ज़ूम के लिए आपको ट्राईपोड का उपयोग करना चाहिए. 

ज़ूमिंग फ़ंक्शन से हर कोई प्यार करता है यह आसान है और आप इसके साथ बहुत कुछ कर सकते हैं, यही कारण है कि यह इतना अधिक उपयोग किया जाता है. पर हम आपको यही कहेंगे कि, ज़ूम का उपयोग कम से कम करें. यह मॉडरेशन में अच्छी तरह से काम करता है लेकिन दर्शकों के लिए बहुत अधिक ज़ूमिंग बोरिंग हो जाता है। 

फोकस (Focus) - ऑटो फ़ोकस सिर्फ नौसिखियों के लिए है. फोटोग्राफी को छोड़कर, एक प्रोफेशनल वीडियो कैमरा ऑपरेटर की जरूरतों को पूरा करने के लिए ऑटो फोकस बिलकुल सही नहीं है. बहुत से लोगों को मैनुअल फोकस मुश्किल लगता है, लेकिन यदि आप अच्छा कैमरावर्क सीखना चाहते हैं, तो फ़ोकस नियंत्रण आवश्यक है। 
पेशेवर कैमरे में आमतौर पर मैनुअल फोकस रिंग लेंस के सामने  होती है (दृश्य 4(a) में देखें)। करीब फ़ोकस के लिए रिंग को घड़ी की दिशा (clockwise) में घुमाएं और दूर के फोकस के लिए घडी की विपरीत दिशा (anti-clockwise)  में घुमाएँ. सबसे अच्छा फोकस प्राप्त करने के लिए, जिस विषय को आप शूट करना चाहते हैं जितना करीब हो सके उस विषय को ज़ूम इन करें और फोकस रिंग को जब तक एडजस्ट करें जब तक विषय पूरा फोकस में नहीं आ जाता और फिर अपने फ्रेम पर वापस ज़ूम आउट करें.

आईरिस (Iris) – यह एक तरह से कैमरे के लेंस पर लगा एक दरवाज़ा है (aperture) जिससे कितनी संख्या में प्रकाश (amount of light) अन्दर आएगा यह तय होता है (इसको exposure भी कहते हैं). आप इसको जितना जायदा खोलेंगे तस्वीर उतनी जायदा उज्जवल (brighter) होगी.

कैमरे में आईरिस रिंग लेंस हुड पर होती है (चित्र क्रमांक - 4(c) में देखें) जिसे बंद करने के लिए उसे घड़ी की दिशा (clockwise) में घुमाएँ और खोलने के लिए घडी की विपरीत दिशा (anti-clockwise)  में घुमाएँ. उपभोक्ता स्तर के कैमरे में आमतौर पर डायल या बटन का एक सेट उपयोग में लाया जाता है. आईरिस को नियंत्रण में रखने के लिए रूल ऑफ़ थम्ब (rule of thumb) है – मुख्य विषय को ध्यान में रखकर अपना  एक्सपोज़र सेट करें. इससे तस्वीर के बाकी भाग कुछ उज्जवल या डार्क हो सकते हैं पर इससे विषय बिलकुल साफ़ दिखाई देगा. 


चित्र क्रमांक - 4(c)

वाइट बैलेंस (White Balance) – वाइट बैलेंस का मतलब कलर संतुलन (color balance) से है. यह एक ऐसा फंक्शन है जो कैमरा को सफ़ेद रंग की पहचान कराके बाकी सभी रंगों की सही जानकारी देता है. क्योंकि अगर कैमरे को यह पता चल गया की सफ़ेद रंग क्या होता है तो वह बाकी रंगों की भी सही पहचान कर सकता है.

यह फ़ंक्शन आमतौर पर उपभोक्ता स्तरीय कैमरों में स्वचालित रूप से काम करता है जबकि कई बार ऑपरेटर को इसके अस्तित्व के बारे में जानकारी भी नहीं होती. यह ज्यादातर स्थितियों में अच्छी तरह से काम करता है, पर कुछ परिस्थितियों में ऑटो वाइट बैलेंस सही काम नहीं कर पाता. इन स्थितियों में रंग गलत या अप्राकृतिक लगेंगे.

वाइट बैलेंस करने के लिए, कैमरे को (उसी लाइटिंग में जिस लाइटिंग में शूट करना है) एक सफ़ेद कागज (नॉन रीफलेक्टिव) पर केन्द्रित (फुल ज़ूम-इन) करके फ्रेम बनायें. अब एक्सपोज़र और फोकस सेट करें उसके बाद वाइट बैलेंस के बटन को दबाएँ. व्यूफाइंडर में सूचक होता है जो आपको बताता है कि वाइट बैलेंस पूरा हो गया है. वाइट बैलेंस को नियमित रूप से करना चाहिए, खासकर तब जब प्रकाश की स्थिति (Lighting condition) में परिवर्तन होता है (जैसे इंडोर से आउटडोर में शूट करने जाते हैं)

ऑडियो (Audio) – वैसे सभी उपभोक्ता स्तरीय कैमरे में माइक्रोफोन पहले से होता है, आमतौर पर यह सही काम करता है और यह जनरल रिकॉर्डिंग करने के लिए अच्छा होता है. 
पर वास्तव में बेहतर ऑडियो परिणाम पाना थोडा मुश्किल विषय है या यह कहें ये अपने आप में एक सम्पूर्ण विषय है. हम इसमें बहुत कुछ नहीं करेंगे – बस आपको यह जानना जरुरी है कि ऑडियो बहुत महत्वपूर्ण है और इसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।  

यदि आप अच्छे ऑडियो परिणाम चाहते हैं, तो अपने कैमरे के "माइक्रो इनपुट" सॉकेट में एक बाहरी माइक्रोफ़ोन को प्लग करने का प्रयास करें (यदि इसमें ये है तो)। ऐसा करने के आपको पास दो कारण हैं:

1. आप एक एसा माइक उपयोग कर सकते हैं जो कैमरे के अंतर्निहित माइक (Internal Mic) की तुलना में आप के काम के प्रकार के लिए अधिक अनुकूल है.
2. आपको परिस्थिति और कैमरे एंगल के अनुसार अलग-अलग जगह पर माइक की आवश्यकता हो सकती है. उदाहरण के लिए, जब हम एक भाषण को कवर करते हैं, तो माइक हमें एक लंबी ऑडियो लीड के साथ पोडियम के ऊपर या आस पास चाहिए हो सकता है.

जिस स्तर (Audio Level) पर आपका ऑडियो रिकॉर्ड हुआ है वह महत्वपूर्ण है। अधिकांश कैमरों में "ऑटो-गेन कंट्रोल" होता है, जो स्वचालित रूप से ऑडियो स्तर को समायोजित (adjust) करता है. उपभोक्ता स्तर के कैमरों में यह आमतौर पर इसी तरह से सेट होता है, और यह अधिकांश स्थितियों में अच्छी तरह से काम करता है. पर अगर आपके पास मैन्युअल ऑडियो लेवल नियंत्रण का विकल्प है, तो इसका उपयोग करना बेहतर होगा. 

अगर हो सके तो बैकग्राउंड (एम्बिएंट – Ambient) को कम या जायदा पर रिकॉर्ड करें, इससे प्रोडक्शन के कार्य में लचीलापन आता है और कभी कभी कुछ शॉट्स के बाद अचानक एम्बिएंट साउंड की आवश्यकता एक इफ़ेक्ट के रूप में पड़ सकती है. 

लोग क्या कह रहे हैं, इसे सुनें और फिर वीडियो बनाएं। किसी को बात करते-करते में शॉट्स शुरू करने और खत्म करने की कोशिश न करें - वीडियो पूरा होने के बाद अगर ऑडियो कटा हुए मिले तो इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता है.

शूटिंग करते समय बैकग्राउंड संगीत का बहुत सावधान रखें - इसका परिणाम यह हो सकता है की जब-जब  शॉट बदलेगा बैकग्राउंड म्यूजिक भी बदलेगा, वो बिलकुल ऐसा लगेगा जैसे कि हम कोई खराब रिकॉर्डिंग को सुन रहे हों.

एक और बात ... हवा के शोर (wind noise) से सावधान रहें यहां तक कि थोड़ी सी भी हवा आपके ऑडियो को बर्बाद कर सकती है. कई कैमरों में "लो-कट फिल्टर" होता है, जिसे कभी-कभी "एयर नॉइज़ फिल्टर" या कुछ इसी तरह के रूप में संदर्भित किया जाता है. ये मदद करते हैं, लेकिन हवा के शोर को रोकना ही बेहतर समाधान है जिसके लिए आप किसी विंडस्क्रीन का उपयोग कर सकते हैं, या खुद इस तरह की कोई चीज़ बनाने का प्रयास कर सकते हैं।

शटर (Shutter) - शुरुआती स्तर पर आपको वास्तव में शटर का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन इसका उल्लेख जरुरी है। इसमें कई अनुप्रयोग (Applications) हैं, जिसका उपयोग विशेष रूप से खेल या फास्ट-एक्शन फुटेज के लिए होता है. इसका मुख्य लाभ यह है कि तेज फ्रेम अच्छे में भी मोशन साफ़ दिखाई पड़ते हैं (जो स्लो मोशन रीपलेस -Replays के लिए जरुरी है). 

शटर का उपयोग एक्सपोज़र को नियंत्रण करने के लिए भी किया जा सकता है. जब तक आपको यह ना पता हो कि शटर प्रभावी ढंग से कैसे उपयोग करें, उसे बंद रखें.

इफेक्ट्स (Effects) - कई उपभोक्ता कैमरों में पहले से डिजिटल इफेक्ट्स चयन करने का विकल्प होते हैं जैसे डिजिटल, मिक्सिंग, स्ट्रोब, आदि.

वीडियो में इतनी सारी चीजें होती हैं जिसे समझना मुश्किल होता है ऐसे में  मॉडरेशन कुंजी है: यदि आपके पास उचित कारण है, तो इसका उपयोग करें, वरना ना करें.

आपको यहाँ यह पता होना चाहिए की कैमरे से किये गये लगभग सभी इफ़ेक्ट, एडिटिंग सॉफ्टवेयर में बेहतर तरीके से किये जा सकते हैं इसलिए हो सके तो हमेशा अपने फुटेज को "शुष्क" यानि (बिना इफ़ेक्ट) के शूट करें और बाद में इफ़ेक्ट जोड़ें.