Friday, 22 December 2017

वीडियो और टेलीविज़न प्रोडक्शन – कैमरा कण्ट्रोल यूनिट (Camera Control Unit)


सीसीयू (कैमरा कंट्रोल यूनिट) - प्रत्येक स्टूडियो कैमरा के पास अपना स्वयं का सीसीयू (कैमरा कंट्रोल यूनिट) होता है. सीसीयू दो मुख्य कार्य करता है: सेटअप और नियंत्रण
सेटअप के दौरान प्रत्येक कैमरा को सही रंग प्रस्तुति के लिए एडजस्ट किया जाता है- सफेद संतुलन, जिसमे एक दृश्य के सबसे उजले भाग और अंधेरे वाले भाग के बीच उचित कंट्रास्ट समन्वयन किया जाता है ।

सीसीयू वीडियो / टेलीविज़न कैमरे के कार्यों के रिमोट कंट्रोल से जुड़े कई उपकरणों और कार्यों को संदर्भित करता है. इसमें आंशिक या पूर्ण कैमरा नियंत्रण शामिल हो सकते हैं. सीसीयू संचालन कई प्रकार के टेलीविजन उत्पादन में एक महत्वपूर्ण घटक है, विशेष रूप से मल्टी कैमरा प्रस्तुतियों में सीसीयू का संचालन करने वाला व्यक्ति सीसीयू ऑपरेटर या वीडियो ऑपरेटर (VO), विज़न नियंत्रक (VC) या (कुछ मामलों में) तकनीकी निदेशक (TD) के रूप में जाना जाता है.

कलर सिग्नल चेक करने के लिए सीसीयू ऑपरेटर के पास दो उपकरण होते हैं -

1. वेवफॉर्म मॉनिटर (Waveform Monitor) – इसको oscilloscope भी कहते हैं. यह ल्युमिनेंस (Luminance) यानी ब्राइटनेस की जानकारी देता है. 

2. वेक्टर स्कोप (Vector Scope)यह क्रोमिनेंस (Chrominance) यानि कलर की जानकारी देता है.

आंशिक सीसीयू कण्ट्रोल (Partial CCU Control) - टेलीविजन उत्पादन में कैमरे के कार्यों को नियंत्रित करने के लिए यह एक सामान्य विधि है। यह एक पेशेवर दृष्टिकोण है, जो अधिकतम नियंत्रण और गुणवत्ता के लिए अनुमति देता है।

अधिकांश कैमरा फ़ंक्शंस (फ़्रेमिंग, फ़ोकस, आदि) आम तौर पर एक कैमरा ऑपरेटर द्वारा नियंत्रित होते हैं, जबकि कुछ फ़ंक्शन (रंग संतुलन, शटर गति, आदि) सीसीयू ऑपरेटर द्वारा दूर से रिमोट द्वारा नियंत्रित होते हैं। इससे कैमरा ऑपरेटर तकनीकी मुद्दों से विचलित हुए बिना फ्रेम और कम्पोजीशन पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। उसी समय सीसीयू ऑपरेटर, जो तकनीकी मुद्दों में अधिक विशेषज्ञ है, चित्रों की गुणवत्ता और स्थिरता पर ध्यान केंद्रित कर सकता है. मल्टी-कैमरा प्रोडक्शन में सीसीयू ऑपरेटर आमतौर पर एक से अधिक कैमरे के लिए जिम्मेदार होता है (2-3 कैमरे सामान्य हैं, लेकिन 10 तक संभव है)। जाहिर है एक बड़े प्रोडक्शन में कई सीसीयू ऑपरेटरों की आवश्यकता हो सकती है। उदाहरण के लिए, एक 20-कैमरे के प्रसारण में 5 सीसीयू ऑपरेटर हो सकते हैं, प्रत्येक को 4 कैमरों को नियंत्रित करना पड़ सकता है.

नीचे दी गई तस्वीर (चित्र क्रमांक 15 (a) देखें) सीसीयू ऑपरेटर के सामने डेस्क कार्यक्षेत्र में एम्बेडेड चार सीसीयू नियंत्रकों के एक बैंक को दिखाती है। ऑपरेटर के सामने प्रत्येक कैमरे से चित्र दिखाने वाले चार मॉनिटर हैं। ये नियंत्रण अपेक्षाकृत उन्नत हैं और सीसीयू ऑपरेटर को निम्नलिखित की अनुमति देते हैं:
  • आईरिस, शटर गति, ब्लैक लेवल, गेन, आदि को नियंत्रित करें 
  • रंग संतुलन (Color Balance) एडजस्ट करें 
  • तकनीकी मापदंडों की एक विस्तृत श्रृंखला को एडजस्ट और मॉनिटर करें 
  • कैमरा ऑपरेटर को सिग्नल भेजें 
चित्र क्रमांक 15 (a) 
पूर्ण रिमोट कैमरा नियंत्रण (Complete remote camera control) - उच्च-प्रदर्शन वाले रिमोट-नियंत्रित कैमरों के आगमन के बाद से, सीसीयू में भी कैमरा यूनिट उपलब्ध है जो सीसीयू ऑपरेटर द्वारा पूरी तरह से नियंत्रित होते हैं. ऐसे नियंत्रकों में पैन / टिल्ट व, ज़ूम और फोकस नियंत्रणों के अलावा, ऊपर उल्लिखित किसी भी सुविधा शामिल हो सकती है। 

Saturday, 18 November 2017

वीडियो कैमरा – व्यूफाइंडर (Viewfinder)

कैमरे के व्यूफाइंडर को कैसे सेट अप और उपयोग करना है

यह पोस्ट काले और सफेद (Black and White) इलेक्ट्रॉनिक व्यूफाइंडर (ईवीएफ) से संबंधित है, हालांकि रंगीन व्यूफाइंडर (Color Viewfinder) मूल रूप से उसी तरह काम करते हैं। (चित्र क्रमांक 14(a) देखें). 

विभिन्न कैमरों में ईवीएफ को एडजस्ट करने के लिए कई विकल्प हैं। उपभोक्ता कैमकोर्डर (Consumer Camcorder) आमतौर पर फोकस / शार्पनेस एडजस्ट करने तक सीमित है, जबकि पेशेवर कैमरों में कई विकल्प हैं निम्नलिखित प्रक्रियाओं के माध्यम से कार्य करें, उन कार्यों की अनदेखी करें जो आपके कैमरे पर उपलब्ध नहीं हैं। 

चित्र क्रमांक 14(a) 
व्यूफाइंडर के ब्राइटनेस और कंट्रास्ट सेट करने के लिए - 
1. कैमरा को कलर बार (Color Bar) विकल्प में स्विच करें.
2. व्यूफाइंडर की ब्राइटनेस और कंट्रास्ट को तब तक एडजस्ट करें जब तक कि स्मूथ ग्रेस्केल नहीं देखते हैं सफेद रंग से काले रंग तक । इसके अलावा आपको प्रत्येक कलर बार के बीच में एक विभाजन रेखा (dividing line) दिखाई देनी चाहिए।
3. अब कैमरा को वापस पिक्चर पर स्विच करें.
4. एक प्रोफेशनल मॉनिटर पर अपने एक्सपोजर की जांच करें, या तो कैमरे के आउटपुट से केबल को कनेक्ट करके या एक टेस्ट रिकॉर्ड करके.

इलेक्ट्रॉनिक व्यूफाइंडर पर कुछ नोट्स -
1. पेशेवर कैमकॉर्डर (Professional Camcorder) में आम तौर पर काले और सफेद EVFs का उपयोग करते हैं उपभोक्ता कैमकोर्डर के साथ रंगीन ईवीएफ अधिक लोकप्रिय हो रहे हैं
2. ईवीएफ अधिकतर WYSIWYG (What you see is what you get) की तर्ज पर काम करता है । इसका मतलब यह है कि अगर व्यूफाइंडर में दिख रही इमेज की ब्राइटनेस बदलती है, तो रिकॉर्ड किए गए सिग्नल में भी ब्राइटनेस बदलती है. एक बार आपके व्यूफाइंडर को सही ढंग से सेट-अप करने के बाद, आप अपनी तस्वीर की गुणवत्ता को सिर्फ देखकर ही न्याय कर सकते हैं (यानी यह कि आपका एक्सपोजर सही है या नहीं, यह देखने के लिए एफ-स्टॉप सूचक का उपयोग करने की आवश्यक नहीं है)।
3. व्यूफाइंडर में दिखाई देने वाले संदेश आपको बहुमूल्य जानकारी देते हैं. इन सभी का मतलब क्या है यह समझने की कोशिश करें.
4. यदि आपका व्यूफाइंडर फॉगिंग कर रहा है, तो अपनी आंख को आई-पिस (Eye piece) से थोड़ा दूर रखें। साथ ही, आपके तरल पदार्थों के सेवन को सीमित करें - यह पसीने को कम करता है, जो कि फॉगिंग का मुख्य कारण होता है.
5. कई व्यूफाइंडर आइपीस को खोला या फ़्लिप किया जा सकता है, जिससे आप कैमरे से थोडा दूर खड़े हो सकते हैं। यह और जायदा उपयोगी हो सकता है जब अगर आपके पास कैमरा ट्राईपोड पर रखा हो, या अगर एक से अधिक व्यक्ति व्यूफाइंडर को देखना चाहते हैं. यह आंखों की थकान को कम करने में भी मदद कर सकता है।

ज़ेबरा स्ट्राइप्स – 
ज़ेबरा स्ट्राइप्स या ज़ेबरा, पेशेवर कैमरों की एक विशेषता है जो एक्सपोजर स्तरों (Exposure Level) का संकेत देते हैं। जब यह सक्रिय होता है, तब विकर्ण लाइन (Diagonal Line) चित्र के किसी भी हिस्से में प्रकट होती है जो ओवर-एक्सपोजर का सन्देश देती है. चित्र क्रमांक 14(b) में देखें.
ये लाइन्स केवल व्यूफाइंडर में दिखाई देती हैं- वे कैमरे से आउटपुट लेने पर या रिकॉर्ड करने पर दिखाई नहीं देतीं. 

चित्र क्रमांक 14(b) 
ज़ेबरा स्ट्रिप्स को सेट करने के लिए-
ज़ेबरा स्ट्राइप्स को चालू करने के लिए "ज़ेबरा स्ट्रिप्स" लेबल वाला स्विच को चालू कीजिये. 
अगर कैमरा में विभिन्न ज़ेबरा सेटिंग्स (जैसे 75% या 100%) के बीच बदलने का विकल्प है, तो आपको पता होना चाहिए कि आप किस सेटिंग का उपयोग कर रहे हैं, और उसके परिणाम क्या होंगे.



Tuesday, 31 October 2017

वीडियो कैमरा – ट्राईपोड (Tripod)

कैसे सही ट्राईपोड का चयन करें और इसे प्रभावी रूप से उपयोग करें

ट्राईपोड (Tripod) क्या है - ट्राईपोड सभी प्रकार के फील्डवर्क के लिए बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है भले ही आप एक स्टूडियो कैमरे के समर्थन के लिए भारी ट्राईपोड का उपयोग करें या फ़ील्ड कैमरा या कैमकॉर्डर के लिए हल्के ट्राईपोड का उपयोग करें, यह सभी ट्राईपोड एक ही प्रिंसिपल पर काम करते हैं: उनके पास तीन पैर (पोड) होते हैं जिन्हें अलग-अलग ऊपर या नीचे किया जा सकता है. जिससे कैमरा लेवल में रहे चाहे फिर वह एक अनियमित सतह पर हो जैसे कि एक उबड़-खाबड़ मार्ग, पहाड़ या सीढ़ियां. (चित्र क्रमांक 13(a) देखें). 

चित्र क्रमांक 13(a)

इसके अलावा इन तीन पॉड्स से एक हेड (Head) जुड़ा होता है. ट्राईपोड का हेड वह हिस्सा है जो कैमरे से बेस-प्लेट (Base Plate) के माध्यम से जुड़ता है और कैमरे को मूवमेंट प्रदान करता है. हेड की गुणवत्ता निर्धारित करती है कि आपका वीडियो कितना अच्छा होगा और कैमरा मूवमेंट्स कितने स्मूथ होंगें. इसके पैरों के निचले भाग में स्पाइक (Spike) और/या रबर कैप (Rubber Cap) लगा होता है जिससे ट्राइपोड फिसलता नहीं है.

ट्राईपोड (Tripod) का उपयोग कब करें - जब आप एक कैमकॉर्डर का इस्तेमाल किसी न्यूज़ रिपोर्ट या किसी घरेलु वीडियो के लिए करते हैं तब आप अधिकतर इसे अपने हाथों से या अपने कंधे पर रख कर शूट करते होंगे, पर जब अधिक सटीक और गंभीर काम की आवश्यकता होती है, तब आपको ट्राईपोड (Tripod) का उपयोग करना चाहिए. चाहे क्यों ना आपका कैमरा छोटा और हल्का हो पर जब भी मुमकिन हो कैमरा को ट्राईपोड पर रखकर ही शूटिंग करें.

अब सवाल यह है की जब हम हाथ से और कंधे पर रखकर हर तरह के मूवमेंट के साथ (चाहे वो टिल्ट हो या पैन) सारे शॉट बना सकते हैं तो फिर ट्राईपोड की क्या आवश्यकता है, तो इसको समझने के लिए ट्राईपोड के कुछ फायदे इस प्रकार हैं– 

1. एक ट्राईपोड के साथ शूट करने पर आप जितनी देर चाहे बिना थके कैमरे का संचालन करने में सक्षम होंगे क्योंकि कई बार हाथ से शूट करने पर एक छोटा सा कैमकॉर्डर भी कुछ देर की शूटिंग करने के बाद बेहद भारी लगने लगता है.
2. ट्राईपोड का उपयोग करने से अनचाहे मूवमेंट्स (जो हाथ के हिलने या कहीं ठोकर लगने से आ सकते हैं) से बचाव होगा और आपके शॉट जायदा स्थिर और प्रभावी बनेंगे.
3. अगर आप हाथ से शूट करने में माहिर भी हैं तब भी ट्राईपोड आपके शॉट को जायदा स्थिर बनाने में मदद करता है.

ट्राईपोड पार्ट्स – 

ट्राईपोड सभी प्रकार के फील्डवर्क के लिए बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। स्टूडियो कैमरा के लिए भारी ट्राईपोड का उपयोग होता है वहीं फिल्ड वर्क के लिए हल्के ट्राईपोड का प्रयोग किया जाता है. यह सभी ट्राईपोड एक ही प्रिंसिप्ल पर काम करते हैं – जिसमे एक ट्राईपोड हेड (Tripod Head) और तीन पोड (Three legs/pods) का एक सेट शामिल है. आम तौर पर ये अलग-अलग घटक होते हैं, हालांकि उपभोक्ता स्तर के ट्राईपोड में आमतौर पर हेड और पैर एक साथ जुड़े होते हैं. सही हेड चुनना और समझना कि यह कैसे काम करता है यह बहुत महत्वपूर्ण है.

सही ट्राईपोड का चुनाव कैसे करें - 

ट्राईपोड चुनते समय किसी भी तरह से उसकी गुणवत्ता से समझौता ना करें क्योंकि कई मामलों में एक अच्छा ट्राईपोड आपके कैमरे की गुणवत्ता को बड़ा देता है – 

अच्छे ट्राईपोड में तीन पैर या पॉड्स लगे होते हैं साथ ही एक हेड भी अलग से जुड़ा होता है. उपभोक्ता स्तर के ट्राईपोड में यह दोनों एक ही यूनिट होते हैं वहीँ व्यसायिक स्तर के कैमरा में यह दोनों अलग-अलग मिलते हैं जिससे इसको एडजस्ट करने में जायदा मदद मिलती है और कई परिस्थितियों में पॉड्स को हेड से पहले बदलने की आवश्यकता होती है. 

चित्र क्रमांक 13(b)
ट्राईपोड हेड - 

अधिकांश हेड फ्लूइड हेड (Fluid Head) होते हैं जो इंटरनल फ्लूइड या तरल पदार्थ का काम करते हैं जिससे हेड में चिकनाहट बनी रहती है और कैमरा मूवमेंट में आसानी होती है. सस्ते हेड में ड्रैग करने की क्षमता ना के बराबर होती है. अच्छे हेड में ड्रैग करने के बेहतर नियंत्रण होते हैं और आपको कैमरा मूवमेंट जैसे टिल्ट और पैनिंग के लिए अलग-अलग विकल्प मिलते हैं.  (चित्र क्रमांक 13(b) देखें)
हेड को चलाके जरुर देखें. जब कैमरा मूवमेंट करें तो यह ध्यान रखें हेड का मूवमेंट भी आसानी से होना चाहिए बिना किसी रुकावट के.

इसके अलावा अच्छे ट्राईपोड में काउंटर बैलेंस (Counterbalance system) होता है जो कैमरे को संतुलित रखने में मदद करता है. यदि आपके पास बड़े या असंतुलित कैमरा हैं तो यह आपके कैमरे को आगे या पीछे करने के बेहतर विकल्प भी देता है जिससे शूटिंग के दौरान कैमरा का संतुलन बनाये रखने में भी मदद करता है. 



लेग्स या पॉड्स –

चित्र क्रमांक 13(c)
स्पष्ट रूप से कैमरे के वजन को रखने के लिए पैरों को काफी मजबूत होना चाहिए। यदि ऐसा कोई मौका आता है जहाँ आपको बाद में अपने कैमरे में (जैसे ऑडियो उपकरण, बड़े लेंस, आदि) किसी भी बाह्य उपकरणों को जोड़ना चाहते हैं तो ट्राईपोड उन्हें भी समायोजित करने में सक्षम होना चाहिए. (चित्र क्रमांक 13(c)देखें.)

ऊंचाई रेंज – ट्राईपोड सबसे कम और सबसे ऊपर वाले पॉइंट की जांच करें, जहाँ ट्राईपोड को निर्धारित किया जा सकता है। एक ट्राईपोड जो कम से कम अपने सामान्य आँख के स्तर से थोड़ा अधिक जा सकते हैं तो वह अच्छा है।

वजन महत्वपूर्ण है अगर आप चारों ओर घूमने की योजना बनाते हैं। अच्छी गुणवत्ता वाले लेग्स आम तौर पर भारी होते हैं, लेकिन आधुनिक ट्राईपोड अक्सर वजन कम करने के लिए कार्बन फाइबर जैसे समग्र सामग्रियों का उपयोग करते हैं।

अंत में, जांच करें कि जो ट्राईपोड आप ले रहे हैं उसे सेट करना आसान है या नहीं? आप जल्दी से सेट और पैकअप करने में सक्षम होना चाहिए.


ट्राईपोड को सेट करना – 

चित्र क्रमांक 13(d)
ट्राईपोड के पैरों का खोलें और स्प्रेडर को एडजस्ट करें और पैरों पर लगे हुक को खोलकर इच्छित ऊंचाई तक लेके जाएँ. यदि आप तेज हवाओं में काम कर रहे हैं, तो आप पैरों या स्प्रेडर पर रेत के बैग आदि डालकर ट्राईपोड को स्थिर कर सकते हैं। यदि स्प्रेडर आपके सेटअप में बाधा डाल रहे हैं, तो आप उन्हें हटा भी सकते हैं.

पेशेवर कैमरे और ट्राईपोड हेड दोनों एक प्लेट के साथ आते हैं जिसे बेस प्लेट (Base Plate) कहते हैं जो कैमरे के निचले भाग में लगती है. इस बेस प्लेट को ट्राई पोड हेड पर जोड़ा जाता है, इस प्रकार कैमरे को ट्राईपोड से जोड़ा जाता है. (चित्र क्रमांक 13(d) देखें)

ट्राईपोड के पैन / टिल्ट नॉब को एडजस्ट करें. ट्राईपोड के हैंडल को आम तौर पर दाहिने हाथ से संचालित किया जाता है, जबकि बाएं हाथ कैमरे के फंक्शन (फ़ोकस, आईरिस, आदि) को संचालित किया जाता है. अगर आप कैमरे में सहायक उपकरण जैसे रिमोट ज़ूम या फ़ोकस नियंत्रण को जोड़ना चाहते हैं तो यह जरुर सोचिये की ट्राईपोड की पोजीशन कहाँ रखनी है क्योंकि ऐसा करने पर आप कैमरे को तुरंत रिलीज़ नहीं कर सकेंगे.

ट्राईपोड के हेड के नीचे एक नॉब होता है जिसको ढीला करने से हेड के स्तर को एडजस्ट कर सकते हैं. यदि हेड में स्पिरिट लेवल (Spirit Level) का विकल्प है, तो आप इसे एक गाइड के रूप में उपयोग कर सकते हैं।

Friday, 8 September 2017

वीडियो कैमरा – वाइट बैलेंस (White Balance)

सही कलर सेट करने के लिए वाइट बैलेंस कैसे करें

वाइट बैलेंस का मूल रूप से अर्थ कलर बैलेंस ही है. यह एक ऐसा फंक्शन है जो कैमरे को "ट्रू वाइट" का संदर्भ देता है - यह कैमरे को बताता है कि सफेद रंग किस तरह दिखता है, जिसके बाद ही कैमरा इसे सही ढंग से रिकॉर्ड कर पाता है. चूंकि सफेद रंग अन्य सभी रंगों का योग है, इसलिए कैमरा को एक बार सफ़ेद रंग की पहचान हो जाए तो कैमरा बाकी सभी रंगों को सही ढंग से प्रदर्शित/रिकॉर्ड कर सकेगा.

गलत वाइट बैलेंस नारंगी या नीले रंग के चित्रों के रूप में दिखाए देते हैं, जैसा कि निम्नलिखित उदाहरणों के द्वारा दिखाया गया है: चित्र क्रमांक - 12 (a) में देखें.

चित्र क्रमांक - 12 (a)

अधिकांश उपभोक्ता स्तरीय कैमकोर्डर में "ऑटो-व्हाइट बैलेंस" सुविधा होती है, इसमें कैमरा ऑपरेटर से किसी तरह का इनपुट लिए बिना कैमरा खुद ही वाइट बैलेंस कर लेता है। वास्तव में, बहुत कम होम-वीडियो उपयोगकर्ता इसकी मौजूदगी से अवगत हैं। दुर्भाग्य से, ऑटो-व्हाइट बैलेंस विशेष रूप से विश्वसनीय नहीं है और आमतौर पर यह फ़ंक्शन मैनुअल रूप से करने पर ही बेहतर रिजल्ट देता है.

मैनुअल व्हाइट बैलेंस कब और कैसे करें
आपको प्रत्येक शूटिंग की शुरुआत में इस प्रक्रिया को करना चाहिए और साथ ही जब भी प्रकाश की स्थिति बदलती है तब भी इसको करना आवश्यक है. जब आप घर के अंदर से शूट करने के बाद बाहर शूट के लिए निकलते हैं तब भी दोबारा वाइट बैलेंस करना चाहिए साथ ही एक कमरे से दुसरे कमरे में जाते समय भी अलग-अलग प्रकार की रोशनी होती है ऐसे में भी वाइट बैलेंस करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। सुबह-सुबह और देर शाम के दौरान, डेलाइट अपना रंग जल्दी-जल्दी और महत्वपूर्ण रूप से बदलता है (हालांकि आपकी आंखें ध्यान नहीं देती हैं, पर आपका कैमरा देता है)। 

इन सभी लाइट की स्थिति बदले पर नियमित रूप से वाइट बैलेंस करें-

आपको मैनुअल वाइट बैलेंस फंक्शन वाले एक कैमरा की आवश्यकता होगी जिस पर एक "वाइट बैलेंस" बटन या स्विच होना आवश्यक है.

1. अगर आपके कैमरे में फिल्टर व्हील है (या यदि आप ऐड-ऑन फिल्टर का उपयोग करते हैं), तो सुनिश्चित करें कि आप प्रकाश की स्थिति के अनुसार सही फिल्टर का उपयोग कर रहे हैं.
2. अपने कैमरे को एक शुद्ध सफेद विषय या कागज़ पर इंगित करके उस पर इस तरह ज़ूम इन करें, ताकि आपको व्यूफाइंडर में सिर्फ सफेद रंग ही दिखाई दे. इस बात पर अलग-अलग राय हो सकती है कि फ्रेम में कितना सफेद रंग होना चाहिए - लेकिन हमने पाया है कि लगभग 50-80% फ़्रेम वाइट होना भी सही है (सोनी के अनुसार फ्रेम की चौड़ाई का 80% वाइट होना सही है). विषय नॉन रेफ्लेक्टिव होना चाहिए.
3. अब एक्स्पोसर सेट करें और फिर फोकस करें.
4. वाइट बैलेंस का बटन दबाकर या स्विच उठाकर उसे सक्रिय करें। इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए कैमरे में कुछ सेकंड लग सकते हैं, जिसके बाद आपको व्यूफाइंडर में इसके पूरा होने का एक मेसेज (या आइकन) प्राप्त होगा.

उम्मीद है कि यह आपको बताएगा कि वाइट बैलेंस सफल हुआ है - इस मामले में, कैमरा मौजूदा कलर बैलेंस को जब तक बनाए रखेगा जब तक फिर से वाइट बैलेंस की प्रक्रिया ना की जाये या प्रकाश की स्थिति ना बदले.

यदि व्यूफाइंडर में यह संदेश आता है कि वाइट बैलेंस विफल हो गया है, तो आपको यह पता लगाना होगा कि ऐसा क्यों हुआ. इसका एक कारण "कलर टेम्परेचर का बहुत अधिक" (जिस स्थिति में फ़िल्टर बदल जाता है) होना भी हो सकता है या आईरिस में कम या अधिक करने से भी हो सकता है.

Thursday, 7 September 2017

वीडियो कैमरा – ज़ूम (Zoom)

प्रभावी ज़ूमिंग की टिप्स और वही प्रभाव पाने के वैकल्पिक तरीके

ज़ूम एक ऐसा फ़ंक्शन होता है जो आपके विषय (Object) को आपके करीब, या दूर करता है, । इसका प्रभाव (Effect) बिलकुल वैसा ही है जैसे कैमरे को करीब या अधिक दूर ले जाते समय होता है. दो सबसे आम ज़ूम मैकेनिज्म (Mechanism) नीचे दिए गए हैं:

1. मैनुअल ज़ूम रिंग (Manual Zoom Ring) - यह ज़ूम रिंग वीडियो कैमरा के लेंस हाउसिंग पर होती है जिसे मैन्युअल रूप से घुमाया जाता है, विशेष रूप से बाएं अंगूठे (Thumb) और तर्जनी उंगली (Index Finger) द्वारा।

फायदे: गति (आप सुपर-फास्ट ज़ूम कर सकते हैं); इसमें पॉवर की आवश्यकता नहीं है (इससे कैमरे की बैटरी की बचत होती है)
नुकसान: नियंत्रण करना थोडा कठिन होता है; स्मूथ ज़ूम करना थोडा मुश्किल होता है.

2. सर्वो ज़ूम लीवर (Servo Zoom Lever) - यह एक लीवर है जो लेंस हाउसिंग पर लगा होता है. जब आप अपने दाहिने हाथ को पकड़ के बेल्ट में स्लाइड करते हैं, तो सर्वो ज़ूम को आप अपनी पहली दो उंगलियों से चला सकते हैं. लीवर के सामने के हिस्से को दबाकर ज़ूम इन करें, पीछे के हिस्से को दबाकर ज़ूम आउट करें। सस्ते कैमरे में आमतौर पर एक ज़ूम गति होती है, जबकि एक अच्छे कैमरे में सर्वो ज़ूम में गति बदली जा सकती है. लीवर को T (टेली) और W (वाइड) भी बोल सकते हैं. 
फायदे: अधिकांश स्थितियों में उपयोग करने में आसान; स्मूथ ज़ूम करने में आसन होता है. 
नुकसान: बैटरी पावर का उपयोग करता है; निश्चित गति तक सीमित हो सकता है.


चित्र क्रमांक - 11(a)

ज़ूम लेंस की एक महत्वपूर्ण विशेषता है जिससे आपको अवगत होना चाहिए: जितना जायदा आप ज़ूम-इन करते हैं उतना ही अधिक कठिन फ्रेम को स्थिर करना हो जाता है, इसलिए जायदा अधिक ज़ूम इन करते समय ट्राईपोड का उपयोग करना चाहिए. यदि आपको अपना शॉट स्थिर रखने में परेशानी हो रही है, तो अपने आप को विषय के करीब ले जाएँ और फिर ज़ूम आउट करें. इस तरह आपको वही फ्रेम मिलेगा पर उससे जायदा स्थिर होगा.

ज़ूम एक ऐसा फंक्शन है जिसे हर कोई उपयोग करता है और आप इसके साथ बहुत कुछ कर सकते हैं, यही कारण है कि प्रोडक्शन के दौरान इसका बहुत अधिक उपयोग किया जाता है पर ज़ूम का उपयोग करने पर हम जो सबसे आम सलाह देते हैं, वह यह है कि इसका उपयोग कम से कम करें.
यह वीडियो कैमरा का बहुत अच्छा फंक्शन है, लेकिन जब आपके अधिकतर शॉट्स में ज़ूमिंग इन और जूमिंग आउट होगा, तो आपके दर्शकों को मतभेद महसूस होगा.

एक नियम के अनुसार, जूम का उपयोग तब तक ना करें जब तक कि इसके लिए कोई कारण नहीं है। यदि आप एक ही शॉट में पुरे दृश्य का विवरण साथ ही कुछ क्लोज-अप विवरण भी दिखाना चाहते हैं, तो आपको ज़ूम इन करने की आवश्यकता नहीं है। इसके बजाय, एक वाइड शॉट शूट करें, रिकॉर्डिंग बंद करें, क्लोज अप में ज़ूम करें, फिर से रिकॉर्डिंग शुरू करें । फिर इन दोनों शॉट को जोड़ के देखें, नतीजा यह भी वही शॉट होता है पर इसमें लगता है अधिक सफाई और जल्दी से दूसरे में कट जाता है, ज़ूम के रूप में यह भी वही जानकारी को चित्रित करता है, लेकिन अधिक कुशलता से.

Thursday, 24 August 2017

वीडियो कैमरा – शटर (Shutter)

शटर का उपयोग कैसे और कब किया जाए

“शटर” शब्द अभी भी फोटोग्राफी से आता है, जहां यह कैमरा लेंस और फिल्म के बीच एक “मैकेनिकल दरवाजा" का वर्णन करता है. जब कोई फोटो लिया जाता है, तो दरवाजा एक पल के लिए खुलता है और फिल्म उस रोशनी के सामने आती है। जिस गति पर शटर खुलता है और बंद होता है वह गति अलग-अलग हो सकती है. गति जितनी अधिक होगी, शटर के खुलने की अवधि उतनी ही कम होगी, और फिल्म पर कम प्रकाश कम समय के लिए पड़ेगा.

शटर गति को फ्रैक्शन ऑफ़ सेकंड में मापा जाता है। 1/60 सेकंड की गति अर्थ है कि शटर एक सेकंड के साठवें हिस्से के लिए खुला है. वहीँ 1/500 की गति तेज है, और 1/10000 की गति वास्तव में बहुत तेज है. चित्र क्रमांक - 10(a) में देखें 

वीडियो कैमरा शटर अभी भी फिल्म कैमरा शटर से काफी अलग काम करते हैं, लेकिन परिणाम मूल रूप से एक ही होता है (तकनीकी अंतर यह है कि यह मैकेनिकल डिवाइस का उपयोग करने के बजाय, शटर की गति इलेक्ट्रॉनिक रूप से सीसीडी को चार्ज करने में लगने वाले समय से बदली जाती है। अगर यह आपके लिए कुछ भी नहीं है, तो चिंता न करें, वास्तव में यह जानना जरुरी नहीं है कि 'शटर कैसे काम करता है, लेकिन उससे होने वाले असर के बारे में पता होना चाहिए. 


चित्र क्रमांक - 10(a)

वीडियो के प्रत्येक फ्रेम के लिए एक बार शटर "खुलता है" और "बंद होता है"; यही शटर, पाल फॉर्मेट में प्रति सेकंड 25 बार और एनटीएससी फॉर्मेट में प्रति सेकंड 30 बार खुलता है. इस प्रकार, अगर एक कैमरा के शटर को 1/60 पर सेट किया गया है, तो प्रत्येक फ्रेम 1/60 सेकंड के लिए खुल जाएगा यदि गति 1/120 है, तो प्रत्येक फ्रेम एक सेकंड के 1/120 हिस्से के लिए उजागर किया जाएगा. याद रखें, शटर गति कभी भी फ्रेम दर को प्रभावित नहीं करती है, यह दोनों पूरी तरह से अलग हैं.

अधिक शटर गति का मुख्य प्रभाव यह होता है कि हर फ्रेम मोशन ब्लर (Motion Blur) के कम होने से शार्प दिखाई देता है. मोशन ब्लर तब होता है जब शटर खुलने के दौरान विषय फ़्रेम के भीतर चलता है. मतलब जितने कम समय के लिए शटर खुली होगी (यानी जितनी शटर की गति तेज होगी), उतने ही देर के लिए शॉट कैप्चर होगा.

अधिक शटर स्पीड का उपयोग स्पोर्ट्स में जायदा किया जाता है. शटर प्रभाव को देखने के लिए किसी भी खेल के प्रसारण पर ध्यान दें कि धीमी गति वाले रिप्ले कैसे दिखते हैं, खासकर जब वे अंतिम फ्रेम स्थिर करते हैं.

Wednesday, 16 August 2017

वीडियो कैमरा – आईरिस (Iris)

सही एक्सपोजर सेट करने के लिए मैनुअल आईरिस का उपयोग कैसे करें

आईरिस (Iris) : आईरिस को हम एक ऐसे दरवाजे (Adjustable Aperture) के रूप में समझ सकते हैं , जो लेंस के माध्यम से कैमरा के अन्दर आने वाली रोशनी की मात्रा को नियंत्रित करता है (जिसको हम एक्सपोज़र (Exposure) भी कहते हैं). 

वीडियो कैमरा का आईरिस मूल रूप से एक फोटो कैमरा के आईरिस के समान काम करता है – जिसमे आप जितना आईरिस खोलते हैं उतना अधिक प्रकाश आता है और तस्वीर उज्ज्वल (Brighter) दिखती है अंतर यह है कि वीडियो कैमरे में जैसे-जैसे आईरिस को बदलेंगे वैसे-वैसे व्यूफाइंडर में तस्वीर की चमक (Brightness) बदलेगी. 

1. व्यावसायिक कैमरे में आईरिस रिंग लेंस हुड पर होता है, जिसको बंद करने के लिये घड़ी की दिशा में घुमाएँ और खोलने के लिये घड़ी की विपरीत दिशा में घुमाएं. चित्र क्रमांक - 9(a) में देखें.
2. उपभोक्ता स्तर के कैमरे आमतौर पर डायल या बटन का एक सेट का उपयोग करते हैं आपको मेनू से मैनुअल आईरिस का चयन करना होगा (विवरण के लिए मैनुअल देखें).

चित्र क्रमांक - 9(a) 

सही एक्सपोज़र क्या है ?

अपने मैनुअल आईरिस का उपयोग करने से पहले, आपको यह जानना होगा कि आपके व्यूफ़ाइंडर में सही एक्सपोजर कैसा दिखता है (ध्यान दें: अगर आपके कैमरे में व्यूफ़ाइंडर सेटिंग्स को एडजस्ट करने का विकल्प है, तो आपको पहले यह करना होगा). एक अच्छी शुरूआत के लिये अपने कैमरे को ऑटो-आईरिस पर सेट करें फिर इवन लाइटिंग में शॉट को फ्रेम करें. अब ध्यान दें की आईरिस में तस्वीर कितनी उज्ज्वल है, फिर मैनुअल पर आईरिस को सेट करें। अधिकांश कैमरे ऑटो-फ़ंक्शन द्वारा निर्धारित उसी एक्सपोजर को बनाए रखेंगे.

हमेशा अपने आईरिस को सेट करें ताकि विषय ठीक से उजागर हो। इसका मतलब यह है कि चित्र में विषय को छोड़कर अन्य भाग में बहुत उजाला या बहुत अंधेरा हो सकता है, लेकिन विषय आम तौर पर अधिक महत्वपूर्ण है वो बिलकुल सही दिखना चाहिए.

व्यावसायिक कैमरों में एक अतिरिक्त सुविधा होती है जिसे ज़ेबरा स्ट्राईब्स (Zebra Stribes) कहा जाता है जो आपको ओवर एक्सपोज़र बताने में सहायता कर सकता है. इसके अलावा एन.डी. फ़िल्टर (Natural Density - ND Filter) से भी अधिक एक्सपोज़र का नियंत्रित किया जा सकता है. चित्र क्रमांक - 9(b) में देखें.


चित्र क्रमांक - 9(b)


एक्सपोज़र सही करने का एकमात्र तरीका अभ्यास है विभिन्न प्रकाश की स्थितियों में शॉट रिकॉर्ड करें, फिर उन शॉट्स को दोबारा चला के देखें तब पता चलेगा की शॉट में एक्सपोज़र सही है या नहीं । याद रखें, अगर आप मैनुअल आईरिस पर काम कर रहे हैं और आप एक्सपोज़र के बारे में निश्चित नहीं हैं, तो ऑटो आईरिस पर फ्लिक करें और देखें कि कैमरा क्या सोचता है, फिर मैनुअल आईरिस पर वापस जाएं। ऐसा करने से धीरे-धीरे आप मैनुअल आईरिस पर अधिक विश्वास करने लग जायेंगे.