Wednesday, 16 August 2017

वीडियो कैमरा – आईरिस (Iris)

आईरिस (Iris) : आईरिस को हम एक ऐसे दरवाजे (Adjustable Aperture) के रूप में समझ सकते हैं , जो लेंस के माध्यम से कैमरा के अन्दर आने वाली रोशनी की मात्रा को नियंत्रित करता है (जिसको हम एक्सपोज़र (Exposure) भी कहते हैं)। 

वीडियो कैमरा का आईरिस मूल रूप से एक फोटो कैमरा के आईरिस के समान काम करता है – जिसमे आप जितना आईरिस खोलते हैं उतना अधिक प्रकाश आता है और तस्वीर उज्ज्वल (Brighter) दिखती है अंतर यह है कि वीडियो कैमरे में जैसे-जैसे आईरिस को बदलेंगे वैसे-वैसे व्यूफाइंडर में तस्वीर की चमक (Brightness) बदलेगी. 

इस पोस्ट में हम आंखों से संपर्क स्थापित करेंगे; यानी, जब तक कि व्यूफाइंडर में एक्सपोजर सही नहीं दिखता तब तक आईरिस का एडजस्ट करेंगे. (एक हल्के मीटर का उपयोग करने के विपरीत).

1. व्यावसायिक कैमरे में आईरिस रिंग लेंस हुड पर होता है, जिसको बंद करने के लिये घड़ी की दिशा में घुमाएँ और खोलने के लिये घड़ी की विपरीत दिशा में घुमाएं.
2. उपभोक्ता स्तर के कैमरे आमतौर पर डायल या बटन का एक सेट का उपयोग करते हैं आपको मेनू से मैनुअल आईरिस का चयन करना होगा (विवरण के लिए मैनुअल देखें).


सही एक्सपोज़र क्या है ?

अपने मैनुअल आईरिस का उपयोग करने से पहले, आपको यह जानना होगा कि आपके व्यूफ़ाइंडर में सही एक्सपोजर कैसा दिखता है (ध्यान दें: अगर आपके कैमरे में व्यूफ़ाइंडर सेटिंग्स को एडजस्ट करने का विकल्प है, तो आपको पहले यह करना होगा). एक अच्छी शुरूआत के लिये अपने कैमरे को ऑटो-आईरिस पर सेट करें फिर इवन लाइटिंग में शॉट को फ्रेम करें. अब ध्यान दें की आईरिस में तस्वीर कितनी उज्ज्वल है, फिर मैनुअल पर आईरिस को सेट करें। अधिकांश कैमरे ऑटो-फ़ंक्शन द्वारा निर्धारित उसी एक्सपोजर को बनाए रखेंगे.

हमेशा अपने आईरिस को सेट करें ताकि विषय ठीक से उजागर हो। इसका मतलब यह है कि चित्र में विषय को छोड़कर अन्य भाग में बहुत उजाला या बहुत अंधेरा हो सकता है, लेकिन विषय आम तौर पर अधिक महत्वपूर्ण है वो बिलकुल सही दिखना चाहिए.

व्यावसायिक कैमरों में एक अतिरिक्त सुविधा होती है जिसे ज़ेबरा स्ट्राईब्स (Zebra Stribes) कहा जाता है जो आपको ओवर एक्सपोज़र बताने में सहायता कर सकता है. इसके अलावा एन.डी. फ़िल्टर (Natural Density - ND Filter) से भी अधिक एक्सपोज़र का नियंत्रित किया जा सकता है.



एक्सपोज़र सही करने का एकमात्र तरीका अभ्यास है विभिन्न प्रकाश की स्थितियों में शॉट रिकॉर्ड करें, फिर उन शॉट्स को दोबारा चला के देखें तब पता चलेगा की शॉट में एक्सपोज़र सही है या नहीं । याद रखें, अगर आप मैनुअल आईरिस पर काम कर रहे हैं और आप एक्सपोज़र के बारे में निश्चित नहीं हैं, तो ऑटो आईरिस पर फ्लिक करें और देखें कि कैमरा क्या सोचता है, फिर मैनुअल आईरिस पर वापस जाएं। ऐसा करने से धीरे-धीरे आप मैनुअल आईरिस पर अधिक विश्वास करने लग जायेंगे.

Thursday, 6 July 2017

वीडियो कैमरा – फोकस (Focus)

अपने वीडियो को मैन्युअल रूप से फ़ोकस करने की क्षमता एक महत्वपूर्ण कौशल है।मैनुअल फोकस काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि अधिकांश पेशेवर कैमरे में ऑटो फोकस की सुविधा भी नहीं होती है.

सबसे पहले फोकस से सम्बंधित शब्दावली को जाने –

सॉफ्ट (Soft) फोकस ना होना (Out of focus) 

शार्प (Sharp)फोकस होना (In focus)

डेप्थ ऑफ़ फील्ड (Depth of field) – लेंस से उतनी दूरी की सीमा जिस पर एक स्वीकार्य रूप से शार्प फोकस प्राप्त किया जा सकता है

पुल ऑफ़ फोकस (Pull of focus) - एक शॉट के दौरान फोकस को किसी अलग बिंदु पर एडजस्ट करना.

मैनुअल फोकस का उपयोग कैसे किया जाता है - सबसे पहले, फ़ोकस रिंग और (ऑटो / मैन्नुअल बटन  - AF/MF) कण्ट्रोल बटन को मैन्नुअल  पर सेट करे. व्यवसायिक कैमरे में आमतौर पर फोकस रिंग सबसे आगे होती है. उपभोक्ता स्तर के कैमरों में आमतौर पर एक छोटा डायल होता है (नोट: आपको मेनू से "मैनुअल फोकस" चुनने की आवश्यकता हो सकती है)


फोटो सौजन्य - सोनी 

1. सबसे पहले यह तय करें की कैमरा मैनुअल फोकस मोड पर सेट है.

2. जिस विषय पर आप फोकस करना चाहते हैं उस विषय पर जितना ज़ूम-इन कर सकते हैं उतना ज़ूम करें.

3. अब फोकस रिंग को एडजस्ट (Adjust) करें जब तक कि तस्वीर शार्प (Sharp – In focus) न हो. विषय के जायदा पास के फोकस (Closer focus) के लिए रिंग को घड़ी की दिशा (clockwise direction) में घुमाएं और विषय से दूर के फोकस (Distant focus) के लिए रिंग को घड़ी की विपरीत दिशा (anticlockwise direction) में घुमाएँ.

4. अब जो फ्रेम बनाना है उस पर ज़ूम आउट करके सेट कर लें – अब फ्रेम बिलकुल साफ़ और शार्प दिखना चाहिए.

यदि आपको अपने कैमरे का फ़ोकस एडजस्ट करने की आवश्यकता है (उदाहरण के लिए, आप प्रधान मंत्री के भाषण की शूटिंग के बीच में हैं, उसी वक़्त आप महसूस करते हैं कि उनके चहरे का फोकस सॉफ्ट है), तो यह फोकस रिंग को बदलने का तरीका जानने में मदद करता है. यदि आप गलत तरीके से फोकस करते हैं तो और अधिक डीफोकस (D focus) होने की सम्भावना होती है.

Tuesday, 4 July 2017

वीडियो कैमरा - फ्रेमिंग (Framing) और कैमरा मूवमेंट (Camera Movement)

कैमरे को विषय की तरफ सिर्फ घुमाने की बजाय आपको विषय को कंपोज़ करना है. जैसे की पहले भी कहा फ्रेमिंग कम्पोजीशन को सर्जन करने की प्रक्रिया है (Framing is the process of creating composition). 
  • फ्रेमिंग तकनीक बहुत ही व्यक्तिपरक (Subjective) है. जो एक व्यक्ति को सृजनात्मक लगता है वही दुसरे व्यक्ति को व्यर्थ लग सकता है. जो कुछ हम यहाँ देख रहे हैं वह मीडिया इंडस्ट्री में स्वीकृत है इसलिए इसे आप रूल ऑफ़ थम्ब (Rule of Thumb) के रूप में उपयोग कर सकते हैं.
  • वीडियो फ्रेम बनाने के नियम अनिवार्य रूप से आज भी बिलकुल फोटोग्राफी के नियम जैसे ही हैं।
फ्रेमिंग के नियम (Some Rules of framing) –
  • रूल्स ऑफ़ थर्ड (Rule of Thirds) - यह नियम फ्रेम को नौ भाग में बांटता है, जैसा कि पहले चित्र क्रमांक 5(j) के फ्रेम में है. इस नियम में मानसिक रूप से आपकी छवि को 2 क्षैतिज रेखाओं (Horizontal Lines) और 2 ऊर्ध्वाधर रेखाओं (Vertical Lines) का उपयोग करके विभाजित किया गया है, जैसा कि नीचे दिखाया गया है. इसमें मुख्य विषय को बीच (Centre) में रखने के बजाय फ्रेम के 1/3 या 2/3 में भाग में रखा जाता है. इसका उपयोग कैसे करें – सबसे पहले यह तय करें की फ्रेम में सबसे महत्वपूर्ण तत्व क्या है और फिर उस तत्व को इन लाइन्स पर या यह लाइन्स जहाँ मिल रहीं है उसके पास या उसके उपर रखने की कोशिश करें. उदहारण के लिए चित्र क्रमांक 5(k) देखें.

चित्र क्रमांक 5(j)


चित्र क्रमांक 5(k) 
  • "हेडरूम (Head Room)", "लूकिंग रूम (Looking Room)", और "लीडिंग रूम (Leading Room)". ये शब्द फ्रेम में खाली जगह का उल्लेख करते हैं जो जानबूझकर खाली छोड़ दिया जाता है। बच्चे जिस दिशा में क्रॉल कर रहा है उस दिशा में कुछ भाग लीडिंग रूम के रूप में छोड़ा गया है (चित्र क्रमांक 5(l) में देखें), और वहीं अगले शॉट में  एक और बच्ची जिस दिशा में देख रही है उसे देखने के लिए उस दिशा में कुछ खाली भाग लूकिंग रूम के रूप में छोड़ा गया है (चित्र क्रमांक 5(m) में देखें). इस खाली जगह के बिना, फ्रेम असुविधाजनक लगेगा. 

चित्र क्रमांक 5 (l)


चित्र क्रमांक 5 (m)
  • वहीं हेडरूम विषय के सबसे उपरी भाग और फ्रेम के सबसे उपरी भाग के बीच की जगह को कहा जाता है. शौकिया वीडियो में एक आम आदमी अधिकतर यही गलती करता है कि बहुत ज्यादा हेडरूम छोड़ देता है, जो अच्छा नहीं दिखता है और पिक्चर को बर्बाद कर देता है किसी भी "व्यक्ति” के क्लोजअप शॉट, एक्सट्रीम क्लोजअप शॉट में, बहुत कम हेडरूम होना चाहिए.
  • आपके फ्रेम में सब कुछ महत्वपूर्ण है, बल्कि न सिर्फ विषय। फ्रेम में पृष्ठभूमि (Background) कैसा है? प्रकाश की लाइटिंग (Lighting) सही है या नहीं? क्या फ्रेम में कुछ ऐसा तो नहीं जो फ्रेम को विचलित कर सकता है, या वीडियो की निरंतरता को बाधित कर सकता है? अपने फ्रेम के किनारों (Edges) पर ध्यान दें फ्रेम में किसी भी वस्तु को आधा दिखाने से बचें, विशेष रूप से किसी व्यक्ति को (किसी के चेहरे का आधा हिस्सा पिक्चर में दिखे तो इसे बहुत नापसंद किया जाता है) साथ ही फ्रेम में किसी व्यक्ति को उसके जोड़ों (Joints) से काटने से भी बचें, जैसे फ्रेम को व्यक्ति के पेट तक रखना ठीक है पर वहीं फ्रेम उसके घुटने तक रहेगा तो सही नहीं लगेगा.
जब आप यह समझ जाते हैं की क्या करना है और क्या नहीं (Do’s and Don’ts), तो आप अधिक रचनात्मक बन सकते हैं। शॉट के अर्थ को व्यक्त करने का सबसे अच्छा तरीका सोचें. यदि कोई बच्चा फर्श पर क्रॉलिंग कर रहा है, तो पहले स्वयं फर्श पर उतरो और उस बच्चे के पॉइंट-ऑफ-व्यू (Ponit of View) से देखने की कोशिश करो. 
हमेशा दिलचस्प और असामान्य शॉट्स बनाने की सोच रखनी होगी. क्योंकि आप अगर ध्यान दें आपके अधिकतर शॉट्स किसी की भी नज़र में सामान्य होंगे जब तक उसमे कुछ मिश्रण करने का प्रयास ना हुआ हो जैसे विभिन्न कोण (Different Angles) और भिन्न कैमरा स्थिति (Different Camera Positions). उदहारण के तौर पर जब किसी शॉट को लो एंगल (Low Angel) से लेते हैं तो सीधे शॉट की तुलना में कहीं अधिक दिलचस्प हो जाता है.

इसलिए जायदा से जायदा टीवी और प्रोफेशनल वीडियो में लिए गए असाधारण शॉट्स को देखें और समझें. सारा खेल कैमरा पोजीशन और कैमरा कम्पोजीशन का है. अपने प्रोडक्शन में भी उसका उपयोग करें.

कैमरा मूवमेंट (Basic Camera Movement) - 

कैमरा फ्रेमिंग के साथ, मूल कैमरा मूवमेंट के लिए भी मानक विवरण होते हैं। जिसमे ये मुख्य हैं:

पैन (PAN) – कैमरा को बिना वर्टीकल मूवमेंट के दायें और बाएं तरफ घुमाना.

टिल्ट (Tilt) - कैमरा को बिना हॉरिजॉन्टल मूवमेंट के ऊपर और नीचे की तरफ घुमाना.

ज़ूम (Zoom) – इन और आउट, जिसमे कैमरा विषय के करीब या उससे दूर जाता है. (हालांकि ज़ूमिंग और कैमरे को विषय के करीब या उससे दूर ले जाना दो अलग चीज़ हैं. आगे की पोस्ट में इस पर विस्तृत जानकारी मिलेगी). जब ज़ूम इन करते हैं तो उसको फ्रेम टाइट “Tighter” करना कहते हैं और जब ज़ूम आउट करते हैं तो उसको फ्रेम लूस “Looser” करना कहते हैं.


फॉलो (Follow) – किसी भी प्रकार का शॉट, जिसमे आप कैमरे को हाथ में पकड़ते हैं (या अपने कंधे पर कैमरे को रखते हैं) और फिर किसी चलते हुए एक्शन को शूट करते हैं उसे फॉलो शॉट कहते हैं. यह शॉट लेना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन जब अच्छी तरह से किया गया हो तो बहुत प्रभावी होता है.

डॉली (Dolly) और ट्रैकिंग (Tracking) - डॉली एक गाड़ी की तरह है जो ट्रैक के उपर चलती है या स्टूडियो में मूवमेंट शॉट को रिकॉर्ड किया जाता है. इसमें कैमरे को डॉली पर रखा जाता है और उसे ट्रैक पर चलाया जाता है और चलते हुए कैमरे पर शॉट को रिकॉर्ड किया जाता है. डॉली शॉट्स में कई अनुप्रयोग (Applications) हैं और बहुत अलग फुटेज प्रदान कर सकते हैं.


नोट: अधिकांश कैमरा मूवमेंट इन मूल कैमरा मूवमेंट के मिश्रण हैं उदाहरण के लिए, जब आप ज़ूमिंग कर रहे होते हैं, जब तक कि आपका विषय फ्रेम के सही केंद्र (Centre) में न हो, आपको उसी समय पैन और/या टिल्ट भी करना होगा जब तक आपका मनचाहा फ्रेम नहीं बन जाता. .

Thursday, 22 June 2017

वीडियो कैमरा – शूटिंग तकनीक (Shooting Technique)

अपनी और अपने कैमरे की सही स्थिति जानें - यदि आप ट्राईपोड का उपयोग कर रहे हैं, तो सुनिश्चित करें कि वह स्थिर और और तीनों तरफ से बराबर हो (जब तक आपके पास इसको टिल्ट (Tilt) करने का कोई कारण ना हो). यदि ट्राईपोड में स्पिरिट लेवल (Spirit Level) हो तो उसे बिलकुल मध्य में रखें. 

यदि आप कैमरे को पैन और/या टिल्ट करने जा रहे हैं, तो इतना जरुर सुनिश्चित करें कि पुरे मूवमेंट के दौरान आपकी पोजीशन आरामदायक हो. 

अगर ट्राईपोड के हेड (Tripod Head) में बाउल ना लगी हो (जो अधिकतर सस्ते ट्राईपोड में पाया जाता है) तो फ्रेमिंग बनाते समय उसका पैन लेवल (Pan Level) जरुर जांचें क्योंकि अगर एक ही दिशा में शूट करना है तो कोई जायदा फर्क नहीं पड़ता पर अगर कैमरे को दायें से बायें पैन करना हो तो उस स्तिथि में पैन लेवल सही होना जरुरी है वरना शॉट ख़राब हो जाएगा.

यदि आप ट्राईपोड का उपयोग नहीं कर रहे हैं, तो आप अपने और अपने कैमरे को यथासंभव स्थिर कर सकते हैं। अपने हाथ और कोहनी को अपने शारीर के पास रखें. साँसों को काबू में रखें. स्थिर शॉट्स के लिए, अपने पैरों को कंधे की सीधी में रखें (यदि आप खड़े हैं तो), या किसी ठोस ऑब्जेक्ट (फर्नीचर, दीवार या कुछ भी) का सहारा लेने की कोशिश करें।



शॉट को फ्रेम करें – उसके बाद कुछ चीजों को त्वरित चेक करें: वाइट बैलेंस, फोकस, आईरिस, फ्रेम (वर्टीकल और हॉरिजॉन्टल लाइन्स, बैकग्राउंड आदि).

अपने ऑडियो पर ध्यान दें - ऑडियो उतना ही महतवपूर्ण है जितना वीडियो, इसलिए इस पर भी उतना ही ध्यान दें.

अब रिकॉर्ड बटन दबाएँ. ध्यान रखें जब आप रिकॉर्डिंग कर रहे हों तो आप सिर्फ रिकॉर्डिंग कर रहे हों क्योंकि इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता की आपकी रिकॉर्डिंग पूरी हो जाए और उसके बाद आपको पता चले की कुछ भी रिकॉर्ड नहीं हुआ है चाहे कारण कुछ भी हो. कई कैमरों के पास "रोल-इन टाइम" टेप होता है, जिसका अर्थ है कि जब आप रिकॉर्ड बटन दबाते हैं और जब कैमरा रिकॉर्डिंग प्रारंभ होता है दोनों के बीच में थोड़ा डिले (Delay) होता है.

व्यूफाइंडर के डिस्प्ले में दिखने वाले सभी संकेतों को लगातार देखते रहें. डिस्प्ले में दिखने वाले सभी संकेत के मतलब को जानने की कोशिश करें - वे आपको बहुमूल्य जानकारी दे सकते हैं

दोनों आँखों का उपयोग करें एक प्रोफेशनल व्यक्ति का एक बड़ा कौशल होता है कि वह एक आंख का उपयोग व्यूफाइंडर देखने में करता है वहीं दूसरी आँख से आस-पास के वातावरण पर नज़र रखता है. इसे सीखने में थोडा समय लग सकता है पर शोल्डर शॉट लेते समय या चलते हुए शॉट लेते समय यह तकनीक काफी सहायक सिद्द होती है. 

पीछे की ओर चलना सीखें - किसी को अपनी पीठ के बीच में अपना हाथ रखकर मार्गदर्शन करने को कहें और फिर पीछे चलते हुए शूट करें, ये शॉट्स बहुत अच्छे लग सकते हैं. आपने कई बार न्यूज़ प्रेसेंटर को चलते हुए इंटरव्यू करते हुए देखा होगा उसमे कामेरापरसन इसी तकनीक का उपयोग करता है.

फ्रेम और ऑडियो के बारे में लगातार सोचें – शूटिंग के दौरान फ्रेम कम्पोजीशन और ऑडियो को लगातार चेक करते रहें. 

कैमरे को मूव करने से पहले "रिकॉर्ड या स्टॉप" बटन दबाएं – रिकॉर्डिंग समाप्त होने के एक या दो सेकंड बाद स्टॉप बटन दबाएँ और फिर कैमरा को मूव करें (जैसे की हम फोटोग्राफी में फोटो लेने के बाद करते हैं). 

कुछ और टिप्स जो आपकी शूटिंग में सहायक होगी

शूटिंग के दौरान डिप्लोमेटिक रहें – जिन लोगों को आप शूट कर रहे हैं उनके बारे में सोचें. याद रहे की अधिकाँश लोग कैमरे के सामने थोड़े नर्वस हो जाते हैं ऐसे में आप थोड़ा सख्त रहें पर साथ ही अन्य विकल्पों के बारे में भी सोचें. 

अच्छे शॉट के लिए कब शोर मचाना या गुस्सा होना सही है और कब नहीं ये फैसला लेना सीखना होगा. अगर कोई महतवपूर्ण शॉट है तो उसे बिलकुल सही तरीके से लेने में कुछ लोगों को असुविधा हो सकती है. पर शॉट के लिए अपना नुकसान करवा लेना गलत होगा, ऐसे में उसका विकल्प तलाशें. 

तिथि/समय स्टाम्प फीचर का उपयोग कब करें – यह फीचर लगातार उपयोग करना सही नहीं होगा, इससे शॉट लो क्वालिटी प्रतीत होता है. इसका उपयोग उतनी देर ही करें जितना जरुरी है बाकी समय इसको बंद रखें. आजकल के डिजिटल कैमरों में यह फीचर आसानी से उपयोग किया जा सकता है. 

प्रयोग करने के लिए तैयार रहें - उन कुछ चीजों के बारे में हमेशा सोचें जो आप करने की कोशिश करना चाहते हैं, फिर खली समय में वह चीज़ करने की कोशिश करें (यानी शादी की शूटिंग करते समय प्रयोग न करें) अधिकांश नई तकनीकों को आदत बनाने के लिए अभ्यास और प्रयोग की ज़रूरत होती है और अच्छे कैमरावर्क के लिए अनुभव की आवश्यकता होती है। 

अगर आप अच्छा काम करना चाहते हैं तो आपको कुछ समय निवेश करना होगा.

Wednesday, 7 June 2017

वीडियो कैमरा – शॉट के प्रकार (Types of Shot)

शॉट का मतलब कम्पोजीशन (Shots are all about composition)

वीडियो उद्योग में एक संस्था है जो आम प्रकार के शॉट्स के नाम रखती है। शॉट्स के नाम और उनके सटीक अर्थ अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन निम्नलिखित उदाहरण मानक विवरणों के लिए मार्गदर्शक हो सकते हैं। बिंदु यह है कि हमें शॉट के नामों को नहीं जानना है (हालांकि यह भी बहुत उपयोगी है), पर उससे जायदा जरुरी है उसके उद्देश्यों को समझना.

मूल शॉट्स को विषय के संदर्भ में संदर्भित किया जाता है। उदाहरण के लिए, "क्लोज अप शॉट" का मतलब कोई चीज़ करीब होना चाहिए. एक व्यक्ति के चहरे का क्लोजअप भी चेहरे का वाइड शॉट, या नाक के वैरी वाइड शॉट के रूप में वर्णित किया जा सकता है.
शॉट के प्रकार (Basic Shot types) - 
निम्न सभी शॉट्स में विषय एक लड़की है जो एक गार्डन में खड़ी है-



चित्र क्रमांक 5(a)  PC - C.M. Gurjar

एक्सट्रीम क्लोज अप शॉट (Extreme Close up shot) - इस शॉट में विषय के शारीर के किसी एक हिस्से के बारे में अत्यधिक विस्तार से बबताया जाता है. लोगों के लिए, ईसीयू का उपयोग भावनाओं को व्यक्त करने के लिए किया जाता है. (चित्र क्रमांक 5(a) देखें)

चित्र क्रमांक 5(b)  PC - C.M. Gurjar

क्लोज अप शॉट (Close up shot) – इस शॉट में विषय की एक विशेष विशेषता या किसी भाग को पूरे फ्रेम में रखते हैं. किसी व्यक्ति के करीब होने का अर्थ आम तौर पर उसके चेहरे का करीब होना है. (चित्र क्रमांक 5(b) देखें)

चित्र क्रमांक 5(c)  PC - C.M. Gurjar

मिड क्लोज अप (Mid close up) – यह शॉट क्लोज अप और मिड शॉट के मीच का शॉट होता है यह शॉट चेहरे को और अधिक स्पष्ट रूप से दिखाता है, बाकी शारीर भी सहज रूप से दीखता है. (चित्र क्रमांक 5(c) देखें).

चित्र क्रमांक 5(d)  PC - C.M. Gurjar

मिड शॉट (Mid Shot) – इसमें विषय के कुछ हिस्से को और अधिक विस्तार से दिखाया जाता है, जिससे दर्शकों को महसूस होता है कि वो जिस विषय को देख रहे हैं वह फ्रेम में पर्याप्त दिख रहा है. वास्तव में, यह एक धारणा है कि अगर आप एक सामान्य वार्तालाप कर रहे हैं तो आप "एक नज़र में" एक व्यक्ति को कैसे देखेंगे. आप उस व्यक्ति के निचले हिस्से पर कोई ध्यान नहीं दे रहे होंगे, इसलिए फ्रेम का वह भाग अनावश्यक है. (चित्र क्रमांक 5(d) देखें).

चित्र क्रमांक 5(e)  PC - C.M. Gurjar

वाइड शॉट (Wide Shot) – इस शॉट में फ्रेम में पूरा विषय दीखता है. व्यक्ति के पैर लगभग फ्रेम के नीचे होते हैं, और उसका सिर लगभग शीर्ष पर होता है. स्पष्ट रूप से इस शॉट में विषय फ्रेम में बहुत कम चौड़ाई कवर करता है, चूंकि फ्रेम विषय के जितने करीब होगा उतना जायदा उसके शारीर का हिस्सा फ्रेम को कवर करेगा. विषय के कुछ भाग ऊपर एवं कुछ भाग निचे को सेफ्टी रूम (हेड स्पेस और फूट स्पेस) कहा जाता है - आप सिर के ऊपर वाले भाग को काटना नहीं चाहेंगे. यह असहज भी दिखाई देगा, यदि फ्रेम में पैर और सीर के ऊपर बिलकुल भी जगह खाली ना हो. (चित्र क्रमांक 5(e) देखें).

चित्र क्रमांक 5(f)  PC - C.M. Gurjar

वैरी वाइड शॉट (Very Wide Shot) – वीडब्ल्यूएस शॉट में विषय दिखाई देता है, परन्तु असल में उसके आस-पास के वातावरण को दिखाने पर जोर दिया जाता है। यह एक स्थापित शॉट (Establish Shot) के रूप में भी काम करता है। (चित्र क्रमांक 5(f) देखें).

चित्र क्रमांक 5(g)  PC - C.M. Gurjar

एक्सट्रीम वाइड शॉट (Extreme Wide Shot) - ईडब्ल्यूएस में, फ्रेम इतनी दूर से दिखाया जाता है जिसमे विषय दिखाई भी नहीं देता है इस शॉट का उद्देश्य विषय के परिवेश को दिखाना होता है. ईडब्लूएस अक्सर एक स्थापित शॉट (Establish Shot) के रूप में उपयोग किया जाता है – इस शॉट को फिल्म के पहले शॉट के रूप में लिया जाता है, दर्शकों को यहाँ बताया जाता है कि आगे होने वाला एक्शन कहाँ पर हो रहा है. (चित्र क्रमांक 5(g) देखें).

चित्र क्रमांक 5(i-1) 

चित्र क्रमांक 5(i-2)

कटअवे शॉट (Cutaway Shot) और कट इन शॉट (Cut-In Shot) - एक कटवे शॉट वह होता है जो आमतौर पर मौजूदा फ्रेम से अलग कोई एक्शन होता है. यह एक अलग विषय हो सकता है या फ्रेम से सम्बंधित कोई एक्शन. वहीं कट इन शॉट फ्रेम के अन्दर के ही किसी भाग का क्लोजअप हो सकता है (जैसे हाथ का मूवमेंट).
(चित्र क्रमांक 5(i-1) देखें - ऊपर दिए गए लड़की के शॉट्स से हटकर ये बच्चे उसी गार्डन में खेल रहे हैं जो की कटअवे का काम करेंगे वहीं चित्र क्रमांक 5(i-2) में लड़की के हाथ का शॉट कट इन शॉट का काम करेगा).
कटअवे और कट इन शॉट को शॉट्स के बीच में “बफर” के रूप में उपयोग किया जाता है (जिससे एडिटिंग में साहयता मिलती है) और अतिरिक्त जानकारी देने या प्रोग्राम को थोड़ा और रोचक बनाने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है.

चित्र क्रमांक 5(j)

टू शॉट (Two Shot) -  इस पर कुछ भिन्नताएं हैं, लेकिन मूल विचार यह है कि वह शॉट जिसमे दो लोग आरामदायक रूप से नज़र आयें. साक्षात्कार में इसका अक्सर प्रयोग किया जाता है, या जब दो प्रस्तुतकर्ता एक शो की मेजबानी कर रहे हैं  विषयों के बीच संबंध स्थापित करने के लिए टू-शॉट अच्छे हैं. किसी भी इंटरव्यू या स्पोर्ट्स ब्रीफिंग के दौरान इसका उपयोग सबसे जायदा किया जाता है जिसमे दो लोग आपस में एक दूसरे से बात करते हैं , टू शॉट दो लोगों को पेश करने का एक स्वाभाविक तरीका है. (चित्र क्रमांक 5(i-1) और 5(j) देखें).

चित्र क्रमांक 5(k)

ओवर द शोल्डर शॉट (Over the shoulder shot) - यह शॉट उस व्यक्ति के पीछे से बनाया जाता है जो विषय को देख रहा है। इस शॉट में विषय का सामना करने वाले व्यक्ति (जिसके पीछे से शॉट बनाया जा रहा है) को आम तौर पर लगभग 1/3 फ्रेम पर कब्जा होना चाहिए। यह शॉट प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति को स्थापित करने में मदद करता है, और दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से एक व्यक्ति को देखने का अनुभव मिलता है। दो लोगों की बातचीत के दौरान इन शॉट्स के बीच कट करना आम बात है (चित्र क्रमांक 5(k) में देखें).


चित्र क्रमांक 5(l-1)

चित्र क्रमांक 5(l-2)

पॉइंट ऑफ़ व्यू शॉट (Point of view shot) - यह शॉट विषय के दृष्टिकोण से एक दृश्य को दिखाता है. यह आमतौर पर इस तरह से संपादित किया जाता है जिससे यह स्पष्ट हो कि इसका पॉइंट ऑफ़ व्यू (POV) क्या है.
चित्र क्रमांक 5(l-1) एवं 5(l-2) में देखें.


चित्र क्रमांक 5(h) 

एरियल शॉट (Aerial Shot) - इस शॉट को किसी हवाई उपकरण जैसे ड्रोन या हवाई जहाज से लिया जाता है जिसमे पुरे एक शहर या ग्राउंड या घटनास्थान का चित्र काफी ऊपर से लिया जाता है जिससे उस जगह के और उसके आस पास के पूरे घटनाक्रम का पता चल सके. (चित्र क्रमांक 5(h) देखें).

Wednesday, 26 April 2017

वीडियो कैमरा - फंक्शन (Functions)

अधिकांश घरेलू कैमकोडर (Camcorder) स्वचालित रूप से काम करते हैं. आपको बस इतना करना है कि उन्हें चालू करें, दिशा दें और रिकॉर्ड बटन दबा दें. ज्यादातर स्थितियों में यह ठीक है, लेकिन स्वचालित कैमरों में कुछ सीमाएं भी हैं. अगर आप अपने कैमरा वर्क में सुधार लाना चाहते हैं, तो आपको अपने कैमरे का नियंत्रण में रखना सीखना होगा. इसका अर्थ अधिक से अधिक मैनुअल फ़ंक्शंस (Manual functions) का उपयोग करना है। वास्तव में, पेशेवर कैमरे के पास बहुत कम स्वचालित फ़ंक्शन होते हैं, और पेशेवर कैमरा ऑपरेटर्स कभी-कभी ऑटो फोकस या ऑटो-आईरिस (Auto Iris) का उपयोग करते हैं।

ऐसे में अधिकतर लोग पूछते हैं कि "क्यों नहीं”? मेरा ऑटो फोकस ठीक काम करता है, और मेरे चित्र ठीक दिखते हैं।" इसके दो जवाब हैं:

1. यद्यपि ऑटो-फंक्शंस आमतौर पर अच्छा काम करते हैं, पर कुछ ऐसी परिस्थितियां होती हैं जिसमे वे सही परिणाम नहीं दे पाते हैं.
2. आपका कैमरा नहीं जान सकता कि आप क्या चाहते हैं सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त करने के लिए या एक कोई विशेष इफ़ेक्ट दिखाने के लिए अक्सर ऑटो फंक्शन की जगह मैनुअल फंक्शन पर काम करना आवश्यक होता है.

जैसे-जैसे आप कैमरे के फंक्शन के बारे में और अधिक जानेंगे वैसे-वैसे आप मैनुअल फ़ंक्शंस के बेहतर परिणाम की सराहना करना शुरू कर देंगे. 
सबसे जायदा उपयोग होने वाले कैमरा फंक्शन को निचे संक्षेप में समझाया गया है (इसका पूरा विवरण आगे के पोस्ट में दिया गया है) –

               
                                                                     
                                                                       प्रोफेशनल कैमकोडर (Professional Camcorder)                                                              
    
                                                                 उपभोक्ता स्तरीय कैमकोडर  (Consumer Level Camcorder)                                                                       
ज़ूम (Zoom) – यह वह फ़ंक्शन है, जो विषय को आपके दृष्टिकोण के करीब ले आता है, या उससे दूर ले जाता है। यह बिलकुल कैमरे को विषय के करीब या अधिक दूर ले जाने के समान है. पेशेवर कैमरे में आमतौर पर मैनुअल फोकस रिंग लेंस के सामने  होती है (दृश्य 4(a) में देखें)

ध्यान दें कि जब ज़ूम इन करते हैं, उस दौरान तब चित्र (फ्रेम-Frame) को स्थिर रखना अधिक कठिन होता है. ऐसे में आप कैमरे को विषय के करीब ले जा सकते हैं और फिर ज़ूम आउट कर सकते हैं जिससे फ्रेमिंग वही रहेगी. लंबे ज़ूम के लिए आपको ट्राईपोड का उपयोग करना चाहिए. 

ज़ूमिंग फ़ंक्शन से हर कोई प्यार करता है यह आसान है और आप इसके साथ बहुत कुछ कर सकते हैं, यही कारण है कि यह इतना अधिक उपयोग किया जाता है. पर हम आपको यही कहेंगे कि, ज़ूम का उपयोग कम से कम करें. यह मॉडरेशन में अच्छी तरह से काम करता है लेकिन दर्शकों के लिए बहुत अधिक ज़ूमिंग बोरिंग हो जाता है। 

फोकस (Focus) - ऑटो फ़ोकस सिर्फ नौसिखियों के लिए है. फोटोग्राफी को छोड़कर, एक प्रोफेशनल वीडियो कैमरा ऑपरेटर की जरूरतों को पूरा करने के लिए ऑटो फोकस बिलकुल सही नहीं है. बहुत से लोगों को मैनुअल फोकस मुश्किल लगता है, लेकिन यदि आप अच्छा कैमरावर्क सीखना चाहते हैं, तो फ़ोकस नियंत्रण आवश्यक है। 
पेशेवर कैमरे में आमतौर पर मैनुअल फोकस रिंग लेंस के सामने  होती है (दृश्य 4(a) में देखें)। करीब फ़ोकस के लिए रिंग को घड़ी की दिशा (clockwise) में घुमाएं और दूर के फोकस के लिए घडी की विपरीत दिशा (anti-clockwise)  में घुमाएँ. सबसे अच्छा फोकस प्राप्त करने के लिए, जिस विषय को आप शूट करना चाहते हैं जितना करीब हो सके उस विषय को ज़ूम इन करें और फोकस रिंग को जब तक एडजस्ट करें जब तक विषय पूरा फोकस में नहीं आ जाता और फिर अपने फ्रेम पर वापस ज़ूम आउट करें.

आईरिस (Iris) – यह एक तरह से कैमरे के लेंस पर लगा एक दरवाज़ा है (aperture) जिससे कितनी संख्या में प्रकाश (amount of light) अन्दर आएगा यह तय होता है (इसको exposure भी कहते हैं). आप इसको जितना जायदा खोलेंगे तस्वीर उतनी जायदा उज्जवल (brighter) होगी.

कैमरे में आईरिस रिंग लेंस हुड पर होती है (दृश्य 4(a) में देखें) जिसे बंद करने के लिए उसे घड़ी की दिशा (clockwise) में घुमाएँ और खोलने के लिए घडी की विपरीत दिशा (anti-clockwise)  में घुमाएँ. उपभोक्ता स्तर के कैमरे में आमतौर पर डायल या बटन का एक सेट उपयोग में लाया जाता है. आईरिस को नियंत्रण में रखने के लिए रूल ऑफ़ थम्ब (rule of thumb) है – मुख्य विषय को ध्यान में रखकर अपना  एक्सपोज़र सेट करें. इससे तस्वीर के बाकी भाग कुछ उज्जवल या डार्क हो सकते हैं पर इससे विषय बिलकुल साफ़ दिखाई देगा. 





चित्र क्रमांक - 4(a)

वाइट बैलेंस (White Balance) – वाइट बैलेंस का मतलब कलर संतुलन (color balance) से है. यह एक ऐसा फंक्शन है जो कैमरा को सफ़ेद रंग की पहचान कराके बाकी सभी रंगों की सही जानकारी देता है. क्योंकि अगर कैमरे को यह पता चल गया की सफ़ेद रंग क्या होता है तो वह बाकी रंगों की भी सही पहचान कर सकता है.

यह फ़ंक्शन आमतौर पर उपभोक्ता स्तरीय कैमरों में स्वचालित रूप से काम करता है जबकि कई बार ऑपरेटर को इसके अस्तित्व के बारे में जानकारी भी नहीं होती. यह ज्यादातर स्थितियों में अच्छी तरह से काम करता है, पर कुछ परिस्थितियों में ऑटो वाइट बैलेंस सही काम नहीं कर पाता. इन स्थितियों में रंग गलत या अप्राकृतिक लगेंगे.

वाइट बैलेंस करने के लिए, कैमरे को (उसी लाइटिंग में जिस लाइटिंग में शूट करना है) एक सफ़ेद कागज (नॉन रीफलेक्टिव) पर केन्द्रित (फुल ज़ूम-इन) करके फ्रेम बनायें. अब एक्सपोज़र और फोकस सेट करें उसके बाद वाइट बैलेंस के बटन को दबाएँ. व्यूफाइंडर में सूचक होता है जो आपको बताता है कि वाइट बैलेंस पूरा हो गया है. वाइट बैलेंस को नियमित रूप से करना चाहिए, खासकर तब जब प्रकाश की स्थिति (Lighting condition) में परिवर्तन होता है (जैसे इंडोर से आउटडोर में शूट करने जाते हैं)

ऑडियो (Audio) – वैसे सभी उपभोक्ता स्तरीय कैमरे में माइक्रोफोन पहले से होता है, आमतौर पर यह सही काम करता है और यह जनरल रिकॉर्डिंग करने के लिए अच्छा होता है. 
पर वास्तव में बेहतर ऑडियो परिणाम पाना थोडा मुश्किल विषय है या यह कहें ये अपने आप में एक सम्पूर्ण विषय है. हम इसमें बहुत कुछ नहीं करेंगे – बस आपको यह जानना जरुरी है कि ऑडियो बहुत महत्वपूर्ण है और इसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।  

यदि आप अच्छे ऑडियो परिणाम चाहते हैं, तो अपने कैमरे के "माइक्रो इनपुट" सॉकेट में एक बाहरी माइक्रोफ़ोन को प्लग करने का प्रयास करें (यदि इसमें ये है तो)। ऐसा करने के आपको पास दो कारण हैं:

1. आप एक एसा माइक उपयोग कर सकते हैं जो कैमरे के अंतर्निहित माइक (Internal Mic) की तुलना में आप के काम के प्रकार के लिए अधिक अनुकूल है.
2. आपको परिस्थिति और कैमरे एंगल के अनुसार अलग-अलग जगह पर माइक की आवश्यकता हो सकती है. उदाहरण के लिए, जब हम एक भाषण को कवर करते हैं, तो माइक हमें एक लंबी ऑडियो लीड के साथ पोडियम के ऊपर या आस पास चाहिए हो सकता है.

जिस स्तर (Audio Level) पर आपका ऑडियो रिकॉर्ड हुआ है वह महत्वपूर्ण है। अधिकांश कैमरों में "ऑटो-गेन कंट्रोल" होता है, जो स्वचालित रूप से ऑडियो स्तर को समायोजित (adjust) करता है. उपभोक्ता स्तर के कैमरों में यह आमतौर पर इसी तरह से सेट होता है, और यह अधिकांश स्थितियों में अच्छी तरह से काम करता है. पर अगर आपके पास मैन्युअल ऑडियो लेवल नियंत्रण का विकल्प है, तो इसका उपयोग करना बेहतर होगा. 

अगर हो सके तो बैकग्राउंड (एम्बिएंट – Ambient) को कम या जायदा पर रिकॉर्ड करें, इससे प्रोडक्शन के कार्य में लचीलापन आता है और कभी कभी कुछ शॉट्स के बाद अचानक एम्बिएंट साउंड की आवश्यकता एक इफ़ेक्ट के रूप में पड़ सकती है. 

लोग क्या कह रहे हैं, इसे सुनें और फिर वीडियो बनाएं। किसी को बात करते-करते में शॉट्स शुरू करने और खत्म करने की कोशिश न करें - वीडियो पूरा होने के बाद अगर ऑडियो कटा हुए मिले तो इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता है.

शूटिंग करते समय बैकग्राउंड संगीत का बहुत सावधान रखें - इसका परिणाम यह हो सकता है की जब-जब  शॉट बदलेगा बैकग्राउंड म्यूजिक भी बदलेगा, वो बिलकुल ऐसा लगेगा जैसे कि हम कोई खराब रिकॉर्डिंग को सुन रहे हों.

एक और बात ... हवा के शोर (wind noise) से सावधान रहें यहां तक कि थोड़ी सी भी हवा आपके ऑडियो को बर्बाद कर सकती है. कई कैमरों में "लो-कट फिल्टर" होता है, जिसे कभी-कभी "एयर नॉइज़ फिल्टर" या कुछ इसी तरह के रूप में संदर्भित किया जाता है. ये मदद करते हैं, लेकिन हवा के शोर को रोकना ही बेहतर समाधान है जिसके लिए आप किसी विंडस्क्रीन का उपयोग कर सकते हैं, या खुद इस तरह की कोई चीज़ बनाने का प्रयास कर सकते हैं।

शटर (Shutter) - शुरुआती स्तर पर आपको वास्तव में शटर का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन इसका उल्लेख जरुरी है। इसमें कई अनुप्रयोग (Applications) हैं, जिसका उपयोग विशेष रूप से खेल या फास्ट-एक्शन फुटेज के लिए होता है. इसका मुख्य लाभ यह है कि तेज फ्रेम अच्छे में भी मोशन साफ़ दिखाई पड़ते हैं (जो स्लो मोशन रीपलेस -Replays के लिए जरुरी है). 

शटर का उपयोग एक्सपोज़र को नियंत्रण करने के लिए भी किया जा सकता है. जब तक आपको यह ना पता हो कि शटर प्रभावी ढंग से कैसे उपयोग करें, उसे बंद रखें.

इफेक्ट्स (Effects) - कई उपभोक्ता कैमरों में पहले से डिजिटल इफेक्ट्स चयन करने का विकल्प होते हैं जैसे डिजिटल, मिक्सिंग, स्ट्रोब, आदि.

वीडियो में इतनी सारी चीजें होती हैं जिसे समझना मुश्किल होता है ऐसे में  मॉडरेशन कुंजी है: यदि आपके पास उचित कारण है, तो इसका उपयोग करें, वरना ना करें.

आपको यहाँ यह पता होना चाहिए की कैमरे से किये गये लगभग सभी इफ़ेक्ट, एडिटिंग सॉफ्टवेयर में बेहतर तरीके से किये जा सकते हैं इसलिए हो सके तो हमेशा अपने फुटेज को "शुष्क" यानि (बिना इफ़ेक्ट) के शूट करें और बाद में इफ़ेक्ट जोड़ें.

Saturday, 22 April 2017

वीडियो कैमरा - योजना (Planning)

योजना (planning): यह सबसे महत्वपूर्ण कदम है, और संभवत: निर्देशक के लिए सबसे मुश्किल काम है। यह वह कार्य जहां आपकी अधिकांश ऊर्जा आपको निर्देशित करती है। 

बड़े प्रोजेक्ट में कैमरा वर्क सिर्फ एक कौशल है- जिसका लक्ष्य आमतौर पर एक पूरा वीडियो, टीवी कार्यक्रम, या किसी तरह की प्रस्तुति का उत्पादन करने के लिए होता है. एक अच्छे कैमरा वर्क के लिए, आपके पास पूरी प्रक्रिया का स्पष्ट चित्र होना चाहिए या कम से कम एक स्पष्ट विचार होना चाहिए की जब यह वीडियो बन जाएगा तो कैसा दिखेगा और कैसा सुनाई देगा .

कोई एक चीज़ है जो पेशेवरों को शौकीनों से अलग करती है तो वह है शौक़ीन हमेशा “विषय और शूट” (point and shoot) करते हैं और पेशेवर हमेशा “योजना और शूट” (planning and shoot) करते हैं l जाहिर है कई बार ऐसी परिस्थिति होती है जब रिकॉर्डिंग से पहले तैयारी करने का समय नहीं मिलता है- कभी कभी कार्यवाही अप्रत्याशित होती है और आपको उसके लिए जाना होता है l इन मामलों में, जहाँ तक संभव हो आपको अपनी योजना के अनुसार चलना चाहिए – योजना सबकुछ है (Planning is everything).

सामान्य कैमरा वर्क के लिए आप योजना को दो भाग में विभाजित कर सकते हैं – “शूट प्लान” और “शॉट प्लान”.

शूट प्लान (Shoot Plan):
इस मामले में “शूट” शब्द एक शूटिंग सत्र को संदर्भित करता है. अगर आप रिकॉर्ड की गयी हर फुटेज को शूट का भाग समझते हैं और प्रत्येक शूट के लिए एक योजना बना रहे हैं, तो आप बेहतर संगठित फुटेज बनाने के रास्ते पर हैं।

सबसे पहले, प्रत्येक शूट के उद्देश्य के बारे में आप पूरी तरह से स्पष्ट होना चाहिए। सामान्यतः, आप जो कुछ भी करते हैं वह एक बड़ी योजना के लिए काम करने जैसा होना चाहिए. 
वास्तव में यह क्या है जो कई कारकों पर निर्भर करेगा-

यदि आप एक फीचर फिल्म बना रहे हैं, तो दीर्घकालिक योजना (long term planning) यह होनी चाहिए कि स्क्रिप्ट / स्टोरीबोर्ड के लिए आवश्यक सभी शॉट्स इकट्ठा करके रखें. 
अगर आप होम वीडियो बना रहे हैं, तो भविष्य की पीढ़ियों के लिए ऐतिहासिक संग्रह बनाने की दीर्घकालिक योजना हो सकती है l 
यदि आप एक “ऑफ” प्रोजेक्ट (जैसे कि शादी का वीडियो) बना रहे हैं, तो भी आपको शूट के लिए दीर्घावधिक निहितार्थों (long term implications) को ध्यान में रखना होगा।

योजना का मतलब है कि एक ऐसा रवैया अपनाना जिसमे नियंत्रण आपके हाथ में हो. जब आप अपना वीडियो कैमरा निकालते हैं, तो यह सोचने के बजाय कि "यह वीडियो अच्छा लगेगा" और जो भी है उसे शूट करना शुरू कर दें, उससे पहले यह सोचें कि, "मैं यह वीडियो कैसे शूट करूँ जिससे यह वीडियो अच्छा लगे” ? फिर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वीडियो शूट करना शुरू करें (जरुरत पड़े तो डायरेक्शन भी करें).

शूट की अनुमानित लंबाई (approximate length) की योजना बनाएं: 
आपको कितना फुटेज शूट करने  करने की जरूरत है, और यह आपको लेने में कितना समय लगेगा? इसकी पूरी योजना शूट शुरू करने से पहले कर लें l इससे आपको उपकरण चुनने में भी मदद मिलती है. 

उपकरण की चेकलिस्ट रखें, जिसमें यह निम्न उपकरण शामिल हो सकते हैं : 
कैमरा, ट्राईपोड,  टेप (डिजिटल कार्ड), बैटरी, माइक्रोफोन, ऑडियो उपकरण, रोशनी के उपकरण, बिजली की आपूर्ति, लॉग शीट्स और अन्य पेपर वर्क.

सम्पादित करने की योजना (Planning to Edit): 
यह महत्वपूर्ण है, यदि आपको लगता है कि यह आपके लिए लागू नहीं होता है, तो आप गलत हैं. आपके द्वारा कैप्चर किए गए सभी शॉट्स को संपादन को ध्यान में रखकर शूट किये जाने चाहिए. 
संपादित करने के दो बुनियादी तरीके हैं: पोस्ट-प्रोडक्शन और इन-कैमरा

पोस्ट-प्रोडक्शन - संपादन का मतलब है कि आपके द्वारा रिकॉर्ड किए गए शॉट को किसी संपादन उपकरण का उपयोग करके उन्हें पुन: संयोजन (जोड़ा) किया जाना । पेशेवरों का काम करने का यही तरीका है – इस तरह से काम करने में शूटिंग के दौरान जायदा आसान हो जाती है और परिणाम भी बेहतर मिलते हैं .सरल पोस्ट संपादन करने के लिए, आपको केवल कैमरा, एक वीटीआर या कार्ड रीडर और कुछ कनेक्टिंग लीड्स जैसे फायरवायर केबल, की आवश्यकता है. आप शूटिंग योजना के अंतर्गत किसी भी क्रम में अपने शॉट्स एकत्र कर सकते हैं, और जितने चाहे उतने शॉट्स शूट कर सकते हैं l संपादन के दौरान आप अवांछित शॉट्स को हटा देते हैं और अच्छे शॉट्स को जैसे चाहे जोड़ सकते हैं l यह एक समय लेने वाला कार्य हो सकता है (खासकर यदि आपको संपादन का अधिक अनुभव नहीं है) लेकिन आमतौर पर इस प्रयास से अच्छे परिणाम मिलते हैं l  

इन-कैमरा – इन कैमरा संपादन का मतलब है कि जो भी आप शूट करते हैं वही आपको मिलता है – जहाँ कोई पोस्ट प्रोडक्शन ना हो l यहाँ मुख्य बिंदु यह है कि आप अभी भी संपादन कर रहे हैं , आप अब भी यह तय कर सकते हैं की कौन सा शॉट पहले जायेगा और कौन सा बाद में बस फर्क इतना है कि ये सारे फैसले आप तब लेते हैं जब आप शूट कर रहे होते हैं बजाय पोस्ट प्रोडक्शन के. यह आसान नहीं है और ना ही ये जरुरी है की हर बार ये सही होगा. 
इसमें नियोजन, दूरदर्शिता और अनुभव की आवश्यकता है

नोट: इसके अलावा एक अन्य ऐसी स्थिति है जिसका उल्लेख किया जाना चाहिए: लाइव मल्टी-कैमरा शूट l इसमें दो या उससे अधिक कैमरे विज़न मिक्सर से जुड़े होते हैं और डायरेक्टर उस कार्यक्रम का लाइव संपादन करवाता है (इसका उदहारण है लाइव क्रिकेट मैच) l इस मामले में, आप संपादन का काम कार्यक्रम के शूट के दौरान उसके वास्तविक समय में कर सकते हैं ।

शॉट प्लान (Shot Plan):
एक बार जब आप अपने शूटिंग सत्र की योजना बना लेते हैं, तो आप व्यक्तिगत शॉट्स की योजना बनाने के लिए तैयार हो जाते हैं । सबसे पहले, हर शॉट को लेने का कोई कारण तय कीजिये । अपने आप से पूछें "मैं इस शॉट के साथ क्या हासिल करने की कोशिश कर रहा हूं”.

क्या यह शॉट आवश्यक है? क्या मैंने पहले ऐसा शॉट लिया है जो अनिवार्यतः एक जैसा है? क्या मेरे दर्शक इस विषय को पसंद करेंगे ? 

एक बार जब आपको लगता है कि शॉट प्राप्त करने के लिए आपके पास एक अच्छा कारण है, तो इसे शूट करने के सर्वोत्तम तरीके के बारे में सोचें l उसके बाद विभिन्न एंगल, फ्रेमिंग के बारे में सोचें l अच्छी रचना को मास्टर स्टेज तक पहुँचाने में समय लगता है लेकिन लगातार अभ्यास के साथ आप वहां पहुंचेंगे।

अपने आप से यह पूछें कि आप इस शॉट के माध्यम से अपने दर्शकों को क्या जानकारी देना चाहते हैं, और यह सुनिश्चित कर लें कि आप शॉट को इस तरह से कैप्चर करें जिससे दर्शक इसे समझ जाएँ । प्रत्येक शॉट को लेने से पहले पूरा समय लें, खासकर तब जब वह शॉट महत्वपूर्ण है.
यदि आवश्यक हो (और यदि आप पोस्ट प्रोडक्शन में संपादन करने वाले हैं), तो शॉट के अलग-अलग एंगल से शूट करें ताकि आप बाद में सर्वश्रेष्ठ शॉट चुन सकें।

इसके अलावा, पोस्ट संपादन के लिए, प्रत्येक शॉट की शुरुआत और अंत में कम से कम 5 सेकंड के अतिरक्त विडियो शूट करें । यह संपादन उपकरणों के लिए आवश्यक है, और यह सुरक्षा बफर के रूप में भी कार्य करता है।